कड़वा सच- रेखा दुबे

शुलभा आरती के थाल से दो पुष्प सुमन भगवान को अर्पित कर ढोक देकर जोर से बोली,अरे मेरे अलाउद्दीन के चिराग कहां हो तुम?. अपना प्रसाद लेकर भगवान से आशीर्वाद तो ले लो।आंनद ने अंदर दे आवाज देकर कहा अभी आया मेरे आका साथ ही आपकी खिदमत में  चाय पकोड़े भी लाया यह कहते हुए आनंद  चाय और पकौड़ी की ट्रे लेकर रूम में दाखिल होता है। उसे देखकर नताशा के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ जाती है उसकी  मांग में भरे हुए सिंदूर से उसके चेहरे की लाली  अपने पूरे निखार पर आ जाती है.वह  मुस्कुराते हुए बोलती है आप भी ना अपनी मीठी-मीठी बातों से बस यूं ही मेरा दिल जीतते रहते हो और मुझे बेवकूफ बनाते रहते हो।
आनन्द हंस कर  अच्छा जी!.तो आज हम पर ये इल्जाम लगाया जा रहा है की हम तुम को बेवकूफ बनाते हैं। जीवन भर से बेवकूफ तो तुमने हमें बनाया है। दोनों खिलखिला कर हंस पड़ते है।हंसते हंसते आंनद अचानक संजीदा हो जाता है और आंख की कोर में आये आंसुओं को धीरे से पोंछ लेता है। क्यों कि वह सुलभा के पूजा के समय अनवरत गिरते आंसुओं को पहले ही देख चुका था और वह उसे ओर दुखी देखना नहीं चाहता था।
 आनंद तुरंत एक पकोड़ा तोडकर आधा सुलभा के मुंह में रखते हुए कहता है देखो ना हमने जहां से जिंदगी शुरू की थी आज वही आकर खड़े है सात फेरों की कसमें निवहाते हुए .ओर सुलभा का हाथ अपने हाथ में ले लेता है ।सुलभा धीरे से अपना दूसरा हाथ भी उसके हाथ पर रखकर कहती है एक बात पूछूं आंनद ?..कहीं हमारा निर्णय गलत तो नहीं था?.. जरा सी जिद्द के कारण आज हम दोंनों अकेले बैठे है।
या हम अपने  बच्चों की परवरिश ठीक  ढंग से नहीं कर पाए?.कहते कहते  सुलभा बेहद  संजीदा हो गई और भरे गले में बाकी के शब्द अंदर ही घुट गए। आनंद एक दम गंभीर होते हुए बोला सुलभा जिंदगी के इस दोराहे पर हमने जो निर्णय लिया वह हमारी जिंदगी का सबसे अच्छा निर्णय है। कल जो होगा देखा जाएगा. आज बाकी बची जिंदगी को खुशनुमा और सुंदर तरीके से कैसे जिया जा सकता है.अब हमको और तुम को सोचना है। 
तुम यह क्यों नहीं सोचती?.की अभी अभी हमने एक दूसरे के लिए जीना शुरू किया है अब हम एक दूसरे के लिए जीने लगे है.आज तक हम अपनी जिम्मेदारियों के लिए जी रहे थे अपने परिवार और बच्चों के लिए जी रहे थे.हमको अपने मन में कोई दुख नहीं होना चाहिए और ना किसी को हमसे कोई गिले-शिकवे की गुंजाइश है। नहीं बेच सकते हम अपना मकान। नहीं बेच सकते अपने ऊपर की छत। नहीं रहना था हमको अपने ही घर में बेगानों की तरह। अगर इस मकान के लिए हमारे बच्चे हमें छोड़कर जाते हैं तो जाएं।अब हमारे मरने पर ही ये मकान बिकेगा उसके पहले नहीं।
बस हमारी जिंदगी की हर पूजा-पाठ ,व्रत,दान और अच्छे कर्म सदैव हमारे बच्चों की रक्षा करें और वह आने वाली पीढ़ी को अच्छे संस्कार दें ,हमारी तरह नहीं जो हम दोनों भाइयों ने किया सिर्फ एक मकान के लिए आपस में दुश्मनी तो पाली और मकान बेचकर माता-पिता को बेघर कर दिया। असंभव में अपने माँ-पिता के पद चिन्हों पर नहीं चलूंगा मैंने उनकी निरीह आखों में एक दर्द देखा है पिता से ज्यादा मां की आखों में उस समय मैं सही निर्णय नहीं ले सका पर आज इस सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ सकता जब मेरी मरती हुई माँ ने कहा था बेटा बुढ़ापे में अपनी देहरी कभी नहीं छोड़ना !सुनते ही सुलभा फफक फफक कर रोते हुए बोली आंनद यह हमारी जिंदगी का वो कड़वा सच है जिसका प्राश्चितय हम कभी भी नहीं सकते दोनों सुबकते हुए मां के फोटो को देखते है।
रेखा दुबे
विदिशा मध्यप्रदेश