मजदूर दिवस पर एक कविता
मंगरू
एक - एक
वोट की की़मत
मंगरू से ज़्यादा
कोई नहीं जानता,
वह जानता है
कि
उसके लिए
कभी ग़रीबी रेखा
ऊपर चली जाती है
कभी नीचे
और कभी
मिट जाती है !
मंगरू को
सभी समझाते हैं
कि
उसके
एक एक वोट की
की़मत क्या है ?
सारी योजनाएं
उसी के लिए
तो बनी हैं!
चुनाव घोषणा पत्र
उसी के लिए
तो बने हैं!
पर,
वह
अपने कुनबे के
सभी लाल पीले कार्ड
संभाल
निकल जाता है,
अपने पुरखों की तरह
कोड़ा कमाने
ताकि
जब वह
बरसात के पहले
कर्मा मनाने लौटे
तो उसके पास
नए कपड़े हों
और
साथ में पूंजी भी
जिससे
वह
अगली खेती कर पाए !
@स्वरचित
सुनील बादल, रांची
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