अंतर्मन का द्वार -आरती

आशा है उम्मीद है,कथा भी है व्यथा भी है । फिर वह कौन सी कड़ी है जो हाथों से छूट रही है। अपना दुख राई से पहाड़ बनताजा रहा था । समझ में नहीं आ रहा था कि दर्द है तो दवा भी होगी , काश दर्द की दवा कोई ढूँढ़ने में मदद कर देता ।
फिर एक हिचकी ! घूटन बंद होती साँसें दम घुटने से पहले खूल कर सांस लेने की चाहत...क्या यह मौत से पहले की है आहट ?
"कौन हो ?  क्यों सवालों के घेरे में मेरी छटपटाहट में भी मजे ले रहे हो ?""मैं हूँ तेरा विवेक ; तुझे आखिरी बार जगाने आया हूँ । तुम्हें अपनी जिंदगी से बेहतर मौत लगती है । मेरा कहना मान लो, वो कहावत तुमने सुनी होगी 'हाथी मर कर भी सवा लाख का' फिर क्यों नहीं तुम अपने अनुभव अपनी खुशी और गम को भूल कर , औरों का मलहम बन जाते हो ?""हूँऊऊं...इसका मतलब कथा की व्यथा सुनने की अब किसी को फुर्सत नहीं, इससे बढिया है ,औरों की कथा पढ़कर सपने उनकी   आँखों में जगाओ विवेक अपनाओ । कथा की व्यथा सभी के समझ में आती कहाँ है ? आशाएं हैं सपने हैं, अवसाद है विवाद भी है, सबसे बढ़कर एक अनकही अंतर्मन को खोलता किवाड़ भी है  ।"
"हाँ शायद तुम ठीक कह रहे हो ! अब सबके सपने सबकी आशाएं सबकी व्यथाओं को खुद में समाहित कर लूँगा पथ प्रदर्शक ना सही एक दीया बन जाऊँगा ,सबके दिलों में उम्मीद का चिराग बन रौशनी फैलाऊँगा ।
विवेक की आवाज आनी बंद हो गई थी , चिराग रौशन करने में वह सफल हो चुका था ,उम्मीद का दीया हताशा और निराशा दूर कर आत्मविश्वास कई दिलों में जगा रहा था ।ढ़लती शाम में वह औरों के मन को रौशन कर अब स्वयं को हल्का महसूस कर रहा था ।


आरती रॉय.मनीला .
फिलीपींस.