चॉंद पर-कंचन




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बादल भी उसे ढकने लगा
करता भी क्या वह
चांद पर वह भी मरने लगा
पहले तो बहुत की अनदेखी
नाच आएंगे उसकी गली
पर हवाओं ने रुख बदला
और वह जा पहुंचा उसकी गली
जितना पास गया वह चांद के
उतना ही खुद से दूर हुआ
करता भी क्या वह
चांद पर वह भी मरने लगा
सोचा थोड़ी देर के लिए ही सही
छुपा लूं उसे दुनिया की नजरों से
और ले चलु कहीं दूर
बस मैं और मेरा चांद
बादल भी उसे ढकने लगा
करता भी क्या वह 
चांद पर वह भी मरने लगा।

कंचन जयसवाल
नागपुर महाराष्ट्र