यूं तो आज भी हम दोनों के बीच छोटी मोटी लड़ाई या फिर खट्टी मीठी तकरार होती ही रहती है।परंतु इनसे पहली लड़ाई मैं कभी नहीं भूल सकती। हुआ यूं कि हमारी शादी को एक महीना हो चुका था और अगले महीने 04 जून को मेरा जन्म दिन था।हम दोनों ही ,विशेषकर मैं जन्म दिन को लेकर बहुत उत्सुक थे। एक दिन पहले नाश्ता करते करते बड़े ही रोमेंटिक अन्दाज में बोले,"कल का पूरा दिन मेरी प्रिय पत्नी जी के नाम यानि कल आफिस से छुट्टी---। हम कनाट प्लेस चलेंगे। पहले तुम मनपसंद ढेर सारी शापिंग करना,फिर फिल्म देखेंगे,बढ़िया सा लंच ,घूमेंगे फिरेंगे और फिर शाम को तुम्हारी पसंद के होटल में जन्म दिन मनाऐंगे क्यों डीयर कैसा रहेगा? मैं तो मन ही मन फूली नहीं समा रही थी। मैंने मुसकुराते हुए कहा,बहुत ही अच्छा। और फिर ये आफिस चले गए। कल का सोच सोच कर ही आज मैंने तो खुशी से गुनगुनाते हुए सारा काम फटाफट खतम कर लिया। शाम हो चुकी थी। जब ये आफिस से लौटे तो कुछ परेशान लग रहे। थे। पानी पीकर झिझकते हुए थोड़े दबे स्वर में बोले,"अरे यार कल वो एक अर्जेन्ट मीटिंग के कारण कल आफिस जाना होगा। सुनते ही मेरा तो दिमाग ठनक गया, माथे पर सलवटें देख जल्दी से बोले, पर तुम चिन्ता मत करो। मैं कल मीटिंग समाप्त कर दोपहर तक घर आ जाऊंगा। ठीक है ना। मैंने कहा,"हाँ ,पर समय पर आ जाना ।हँसते हुए बोले हाँ, हाँ क्यों नहीं आऊंगा।तुम बस तैयार रहना। आते ही हम कनाट प्लेस चलेंगे।अगले दिन इनके आफिस जाने के बाद जल्दी जल्दी घर का सारा काम निपटाकर मैं तो बस लग गई अपनी तैयारी में। मन में खुशी की तरंगें उठ रही थीं बस सज सँवर कर बैठ गई इन्तजार में।जाने को उतावली जो थी। राह ताकते ताकते शाम के छह बज गए। मन में चिंता और गुस्सा दोनों ही उछलकूद मचा रहे थे।थोड़ी देर बाद मैंने देखा ये दरवाजे पर खड़े हैं। धीरे से अंदर आकर सोफे पर बैठ कर दबी आवाज में अपराधी की भाँति बोले, यार माफ कर दो वो बाॅस ने मैं तो बस बीच में ही बरस पड़ी, हाँ, जन्म दिन मेरा था न,सोचा होगा बीवी तो है,रोएगी चिल्लाएगी बस क्या फर्क पड़ता है।खुद की भावनाओं को ठेस लगे तो पता चलेगा न। चुपचाप सुनने के बाद बोले देखो गुस्सा मत करो प्लीज।अभी भी समय है हम अच्छे से सैलीब्रेट कर सकते हैं। मेरी बात समझने की कोशिश करो। इतनी विनम्रता देख अंदर ही अंदर मेरा गुस्सा शांत होता जा रहा था। मैंने बस "हूं" कहकर सिर हिला दिया तभी घंटी बजती है ।खोलकर देखा तो एक लड़का पैकेट देते हुए बोला मैडम आपका केक। मैं हैरान हो कुछ सोच ही रही थी कि इन्होंने कहा, "अरे हाँ ले आओ। केक लेकर हम दोनों ने केक कट किया।खाना आर्डर कर मजेदार डिनर भी किया।मैं मन ही मन प्रसन्न महसूस कर रही थी।और फिर मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर डायमंड की रिंग मेरे हाथ पर रखते हुए मुस्कुराकर बोले," माफ करो यार, अब गुस्सा खतम करो प्लीज।जल्दबाजी में लौटते हुए खरीदारी की कोशिश की।शायद तुम्हें थोड़ा तो ठीक लगा होगा? मैं मन में सोच रही थी कि इतनी व्यस्तता के बावजूद भी इन्होंने मेरी भावनाओं का इतना ध्यान रखा और एक मैं थी कि ----। अब मेरा गुस्सा छू मंतर हो चुका था। मुझे मन में कहीं अपने व्यवहार पर शर्मिंदगी भी हो रही थी। फिर देर तक बैठ कर दोनों अपनी अपनी गलतियों पर खूब हँसे और इस तरह दोनों की लड़ाई हँसी मजाक में बदल गई। तभी तो पति पत्नी की लड़ाई,लड़ाई न होकर उस रस के समान होती है जो दोनों के रिश्ते में ताजगी भर देता है।
सुधा बसोर
वैशाली (गाजियाबाद)
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