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ऐसा रूप सँवरना उनका।
दर्पण सम्मुख है इठलाना।।
दर्पण की निर्मलता इनमें।
दूर दूर तक है झुठलाना।।
क्रीम लगी दीवारें मुख पर।
मुखड़ा में रौनक बना रही।।
इत्र बाग की खुशबू देकर।
मन बगिया को है लुभा रही।
सपने के झूले में सुखमय।
क्रत्रिम रुप को है बहलाना।।
भ्रम की बेलायें फैंली हैं।
आशाओं के बादल गहरे।।
दोष नजर का खौफ सताये।
शंकाओं के लगते पहरे।
नजरों का बढ चढ़कर हिस्सा।
नजरों में दिखता झुँझलाना।।
घर में रहकर भूल गये थे।
पर्दे में कैसे है रहना।
बेपर्दे के पर्दे में रह।
चेहरा ही ढंकते रहना।
अंकुश के पर्दे में घायल।
जख्मों को देकर सहलाना।।
सपनों की है हेरा फेरी।
ये दुखड़े हैं जज्बातों के।।
इच्छायें बुनियादी करने।
चलते खंजर उन्मादों के।।
राम कहें मन रूप सँवारो।
जीवन जीना सिखलाना।।
डॉ रामकुमार चतुर्वेदी
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