व्यंग्य कथा लायक औलाद-सुभाष चंदर

कहानी बिना टीम-टाम के शुरू करता हूं। एक बुढ़िया थी और एक उसका बेटा था। बेटा जरूरत से थोड़ा सा ज्यादा लायक था। इसीलिये अपनी बूढ़ी मां से अलग रहता था। अलग रहने के पीछे लायक होने के अलावा भी कई तकनीकी कारण थे। पहला कारण तो उसका यह मानना था कि मां नामकी वह जो बूढ़ी है,परले दर्जे की गंवार है। नौकर-चाकरों तक से बतियाती है। दिन-भर खों-खों करती है। हर जगह अपनी पोटली खोलकर बैठ जाती है। उसके पुरानेपन के कारण उसके नये घर की शोभा बिगड़ने का ख़तरा रहता है। दूसरा कारण भी काफी पुख्ता किस्म का था । बुढ़िया के पास जो चार लाख रुपये बाप के फंड के थे,उन्हें वह आधे से ज्यादा उसी बाप नामधारी बुड्ढे की बीमारी पर खर्च कर चुकी थी। उस बुड्ढे के मरने के बाद जितना पैसा बचा है,उस पर सांप की तरह फन उठाये बैठी है। कितना ही मनाने के बाद वह उस पैसे में से और गांव की प्रापर्टी में से कुछ भी देने को तैयार नहीं होती।
सो बेटे को ऐसी खाली-पीली बुढ़िया को मां मानने से फायदा ही क्या था। सो वह लायक बेटा शहर की एक पॉश कॉलोनी में बुढ़िया को शीघ्र मरने की कामना करते हुए दिन काट रहा था। बुढ़िया भी उसी शहर के दूसरे मुहल्ले में उसके लायकपन को याद कर-करके अपना बुढ़ापा जी रही थी। यानी दोनों मां-बेटे अपनी-अपनी तरह से एक-दूसरे को याद करते हुए समय व्यतीत कर रहे थे। किन्तु बुढ़ापा बैरी काफी नाटकबाज़ होता है। सो उसने एक नाटक दिखाया। हुआ यह कि बुढ़िया एक दिन घर साफ करते हुए गिर पड़ी। गिरते ही उसकी कूल्हे की हड्डियों ने विद्रोह कर दिया। हड्डी का चटखना,बुढ़िया का चीखना और पड़ोसियों का बुढ़िया के बेटे का कोसना जैसी क्रियाएं लगभग साथ-साथ सम्पन्न हुई।
इसके तुरन्त बाद मोहल्ले के कुछेक बुजुर्गों ने बेटे के घर जाकर उसे उसका बेटापन याद दिलाया और उसे उसके लायक औलाद होने का वास्ता देकर किसी तरह बुढ़िया तक ले आये। बेटे ने बुढ़िया की चोट देखी। चोट में अपने भविष्य की संभावना टटोली। डॉक्टर को बुलाया उससे बात की और जब वह निश्चिंत हो गया कि इस चोट से यमलोक पहुंचने की कोई संभावना नहीं है तो उसे अपना फर्ज याद आ गया। उसने अपना बेटापन निभाया और बढ़िया सेवा के उद्देश्य से मां नाम की उस बुढ़िया को खैराती अस्पताल में भर्ती कर आया।
बुढ़िया उस सरकारी अस्पताल में पूरे सात महीने रही। पहले तीन महीनों में बेटा पूरे तीन बार उससे मिलने आया। एक बार इलाज़ पर काफ़ी खर्च और घर की परेशानियों का वास्ता देकर पचास हज़ार का चैक ले गया। दूसरी बार परेशानियों के ड्योढ़ी बढ़ने के अनुपात में पचहत्तर हज़ार ले गया। तीसरी बार आया तो उसके हाथ में वसीयत के कागज़ थे जिसके अनुसार बुढ़िया ने गांव की तेरह बीघे ज़मीन, शहर का घर और बैंक के सारे बैलेंस का मरणोपरांत स्वामी बेटे को बनाया था। बेटा इतना काम कर लाया था। बुढ़िया को सिर्फ़ हस्ताक्षर भर करने थे। वसीयत रूपी दस्तावेज़ों को देखते-देखते बुढ़िया को याद आया कि उसके हाथ में दर्द है। सो वह अपनी अंगुलियों के अकड़ने-सूजने का जिक्र करने लगी। लड़का कुछ देर बैठा रहा। पर चूंकि वह डॉक्टर नहीं, इंजीनियर था,इसलिये कुछ न कर सका और तीन-चार दिन बाद फिर आने का वायदा कर के लौट गया।
बुढ़िया को अपने बेटे की सेवा का ढंग काफी पसंद आया। लेकिन इससे ज़्यादा सेवा कराने से उसे अपच हो सकता था। बुढ़ापे में अपच कितना ख़तरनाक हो सकता है,बुढ़िया जानती थी। उसने पूरी एक रात खूब सोचा। सुबह जब वह उठी तो उसके हाथों की अंगुलियां ठीक काम कर रही थी। इसका फ़ायदा उसने जमकर उठाया। अस्पताल के वेटर से अपने वकील को बुलाया और उसी समय अपनी वसीयत जो थी अनाथालय के नाम कर दी। यानी उसके मरने के बाद उसका मकान,गांव की ज़मीन,बैंक-बैलेंस वगैरह सब अनाथालय के नाम हो जाएगा।
इस घटना के ठीक चार दिन बाद बेटा आया। वसीयत के कागज़ साथ लाया। उसने पहले अंगुलियों का हाल पूछा,फिर बुढ़िया का। उसके बाद जेब से निकालकर कागज़ आगे कर दिए। बुढ़िया ने काग़ज़ देखे ,बेटा देखा और फिर हस्पताल का अपना बेड देखा । इन तीनों के दर्शन से उसे ज्ञान की प्राप्ति हो गई। उसने यह ज्ञान बेटे को भी ट्रांसफर करना शुरू कर दिया।उसने बेटे को समझाया कि पैसा ही पाप का मूल है। वह भला अपने निजी बेटे पर पाप कैसे चढ़ाती ?सो उसने वो सारी पाप की जड़ यानी माया महाठगिनी अनाथालय वालों के सिर डाल दी। अब वे जाने और उनका काम। अपनी जान में बुढ़िया ने बड़ी ज्ञान की बात की थी ।पर पता नहीं क्यों बुढ़िया के ये वचन सुनकर बेटा पिनपिना गया । उसकी सेवा के समुद्र में तूफान आ गया। इस तूफान के फलस्वरूप बुढ़िया का पलंग हिलने लगा। दवाई की शीशियां ज़मीन की बीमारी ठीक करने लगीं। पानी का गिलास गर्म कम्बल को ठण्डा करने में जुट गया। इतना सब कार्यक्रम सम्पन्न करने के बाद भी बेटे का सेवा भाव कम नहीं हुआ था। सो वह ऊंचे स्वर में गालियों से मां की वंदना करने लगा। बुढ़िया को दिए जा रहे गालियों के प्रसाद की कुछ मात्रा अस्पताल के स्टाफ ने भी ग्रहण कर ली थी। सो उन्होंने ऐसे सेवाभावी बेटे को उसकी गालियों समेत बाहर कर दिया। बेटा जाते-जाते कह गया कि वह बुढ़िया के जीते जी अपनी सूरत उसे कभी नहीं दिखायेगा।
किन्तु बुढ़िया के बेटे को अपनी यह कसम तोड़नी पड़ गयी क्योंकि सात-आठ महीने बाद ही अस्पताल वाले अपनी बला को उसके घर छोड़ गये। ताकि वही अपनी मां की अपने हिस्से की सेवा पूरी कर सके। साथ ही यह दिलासा भी दे गये कि बुढ़िया बमुश्किल तीन-चार महीने और जियेगी। घर पर बेटे को अपनी पत्नी की काफी झाड़ का रसास्वादन करना पड़ा कि वह अस्पताल में अपने घर का पता क्यों लिखा आया था। अब चूंकि कॉलोनी वालों के सामने वह बेटे उर्फ सिंह साहब,असिस्टेंट इंजीनियर की मां थी और वे सभी बाहर खड़े थे। मां से हाल-चाल पूछ रहे थे। सो अपनी मां नाम की उस बुढ़िया को सादर घर में रखना पड़ा।
कालान्तर में बेटे-बहू ने उसकी खूब जी-भर कर सेवा की। बेटे ने अपनी पूजा-पाठी मां की आत्मा को परमात्मा से मिलाने के लिये डाॅक्टर तक से प्रार्थना की। किन्तु डाॅक्टर कमबख्त ईमानदार तो बनता ही था,अधर्मी भी निकला। एक लाख तक में धार्मिक बनने को तैयार नहीं हुआ। सो ज़हर की सुई के माध्यम से बुढ़िया के स्वर्गलोक की यात्रा का पुनीत कार्यक्रम अधूरा रह गया।अब बेटे-बहू दोनों मिलकर मन,वचन और कर्म तीनों से बुढ़िया की सेवा में लग गए। बुढ़िया को इन्जेक्शन से दर्द होता था,दवाइयां कड़वी लगती थीं,वे सब हटा ली गयीं। उसके बाद डाइटिंग कराने के उद्देश्य से खुराक आधी कर दी गयी। बहू आते-जाते “हाय राम ये बुड्ढ़ी तो काले तिल खा के उतरी है,भगवान जाने कब मरेगी’जैसे भजनों का रोज़ प्रसारण करती। ताकि बुढ़िया को सत्संग की कमी न खले। बेटा भी पूरी कोशिश करता। एक बार कहीं पढ़ आया कि अगर व्यक्ति को अकेला रखा जाए तो उसकी उम्र काफी कम हो जाती है। वृद्धों के शीघ्र स्वर्णाश्रम पहुंचने की ये सर्वोत्तम दवा है। मां के लायक बेटे ने अपनी प्यारी मां के लिये इस पर भी अमल किया। पहले चरण में कमरे में ब्लेक एंड व्हाइट टी.वी. और रेडियों हटा लिये। दूसरे चरण में बच्चों को बुढ़िया के कमरे में न घुसने की हिदायत दी गयी। नौकर को भी बोल दिया गया कि वह कमरे में खाना देकर एकदम लौट आये। माताजी से कोई बात न करे,वरना उनकी समाधि टूट जायेगी।
इन उपायों का बुढ़िया पर काफी बढ़िया असर हुआ। सो वह अकेली पड़ी-पड़ी अपनी खांसी का संगीत सुनती। सन्नाटों से बात करती,उनसे जवाब पाती। वक्त मिलता तो बड़बड़ाकर बेटे-बहू का शुक्रिया जताती।


इसी तरह बुढ़िया को अपने बेटे-बहू से सेवा कराते-कराते दस-ग्यारह महीने बीत गये। इसी बीच बेटे का मेडिकल में पढ़ रहा बड़ा लड़का छुट्टियों में घर आया। घर आके उसने बहुत कुछ देखा सुना। उसने बुढ़िया देखी।फिर बुढ़िया के बारे में,उसकी वसीयत के बारे में और न जाने किस-किस के बारे में क्या-क्या सुना। इतना सब सुनने के बाद भी बेटे का आधा डाॅक्टर बेटा,सपूत से,कपूत की पदवी पा बैठा। यानी वह अपनी मां के मना करने के बाद भी अपनी दादी के पास चला गया। वह कई घण्टों तक दादी नामकी उस बुढ़िया से बात करता रहा। जब वह बाहर निकला तो उसने बाप को ऊंची आवाज़ में खूब खरी-खोटी सुनाई। मां पर खूब बरसा। यह सब बुढ़िया ने भी सुना। उसे लगा कि बेटे-बहू की सेवाका मूल्यांकन करने वाला कोई तो मिला। उसी शाम से बाप ने बेटे से ना बोलने की कसम खा ली। बेटे की मां ने मुंह फुलाने का सफल अभ्यास किया। लेकिन पोते ने इस बात की कतई फिक्र नहीं की। वह हरदम अपनी दादी के साथ रहता। उसे दवाई देता। खाना अपने हाथों से खिताता। उसी कमरे में सोता। रात को वह और दादी जाने क्या-क्या बातें करते। वह रोज़ दादी को बताता-”दादी,तुम चिन्ता मत करना। किसी लायक हो जाऊं। फिर इनके साथ भी वैसा ही करूंगा,जैसा इन्होंने तेरे साथ किया है। ये भी तो कभी बूढ़े होंगे।”दादी उसकी बातों पर खूब खुश होती। अपने भले पोते की बलैयां लेती। पोता दादी के पास महीने भर रहा। इस बीच वह दादी को बाप के स्कूटर पर बैठाकर पता नहीं कहां-कहां घुमा लाया। सत्संग,मंदिर और न जाने कहां-कहां। लगभग रोज़ ही वे सुबह निकल जाते। शाम को लौटते। इसी तरह महीना भर बीत गया। यानी दादी-पोते की कथा का अन्तिमक पड़ाव आ गया। पोते की छुट्टियां खत्म हो गयी। विदा लेते समय दादी-पोते ने रोने का कार्यक्रमक सम्पन्न किया। हां जाते-जाते आधा डाॅक्टर पोता,दादी को उसकी बीमारी की दवाईयां दे जाना ना भूला।
इस बार बुढ़िया के पास बहुत कुछ था। गालियों,रोटियों वगैरहा के साथ और भी बहुत कुछ खाने को था। गुड़ सी मीठी यादें तो वह अपने पोपले मंुह में रखकर हर वक्त चूसती। दोनों टाइम नेम से पोते की लाई दवाइयां खाती। किन्तु इस सबके बावजूद उसकी हालत खराब होती जा रही थी। तीन-चार दिन बाद ही बुढ़िया ने पोते को याद करते-करते दम जो था,वह तोड़ दिया। उसकी आत्मा सीधी स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान कर गयी।
बेटे-बहू की इतनी लम्बी तपस्या को फल मिल गया। अगले दिन बड़े धूम-धाम से सिंह साहब असिस्टेंट इंजीनयर उर्फ बेटे की आदरणीय माताजी की शवयात्रा निकली। बहुत सारे लोगों ने इस बारात में भाग लिया। पर जान-बूझकर मां-बाप ने कपूत उर्फ बुढ़िया के प्यारे पोते को नहीं बुलाया। किन्तु तेरहवीं की रस्म पर बिना बुलाए दादी का प्यारा पोता आ गया। आकर उसने सबसे पहले अपने हिस्से का रोने-धोने का कार्यक्रम सम्पन्न किया उसके बाद सारे पंडितों को खाना खिलाया। दक्षिणा में इक्कीस की जगह इक्यावन-इक्यावन रुपये दिए। वह भी अपनी जेब से। शाम को अपनी दादी की तस्वीर इनलार्ज करा कर लाया और मां के नाम-भौंह सिकोड़ने के बाद भी ड्राइंगरूम में टांग दी। बाप उसे देखता रहा। उसकी इच्छा हुई कि पूछे कि इतने पैसे कहां से लाया। पर बापपने ने मुंह सिल दिया।
रातभर मियां-बीवी में रुन-झुन हुई। तय ये हुआ कि बीवी ही बेटे से पैसों का राज़ पूछे। बीवी ने कपूत से पूछा। जब वह बेटे के कमरे से वापस आई तो पति से सिर्फ़ इतना बोली,“मैं ना कहती थी,किशना हमारा सबसे लायक है। तुमसे जो काम इतने दिन में ना हो सकता। वो मेरेसपूत ने एक महीने में कर दिखाया।”
इस पहेली का हल बूझने के लिये बाप अपने बापपने की शान त्यागकर सीधा बेटे के कमरे की ओर झपटा। वहां उसने देखा कि उसका लायक बेटा प्रसन्न चित मुद्रा में एक फाइल खोले बैठा है। बाप ने फाइल उठायी तो वह अवाक् रह गया।उस फाइल में बुढ़िया का वसीयतनामा था जिसमें अनाथालय को की गयी वसीयत कैंसिल करके किशना को उसकी सारी सम्पत्ति का स्वामी बनाया गया था। पास पड़ी बुढ़िया के खाते की पास बुक भी इस बात की गवाही दे रही थी। 

सुभाषचंदर जी नईदिल्‍ली, मोब -09311660057