मुख्यमंत्री का कार्यक्रम समारोह आयोजित था इसमें उन्हें आना ही था। उनका कार्यक्रम समाज कल्याण को समर्पित था। कार्यक्रम स्थल पर सभी विभागों की प्रदर्शनी लगी थी जिसमें विभागों ने अपने-अपने विभागों की चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी जनता को देने हेतु बैनर पोस्टर पर्चे आदि उपलब्ध करा रखे थे, साथ ही उन्हीं पंडालों में लाभान्वित होने वाले हितग्राहियों को भी आमंत्रित किया गया था। एक बड़ा वाटरप्रूफ पंडाल जनता के लिए भी लगाया गया थ ठीक वैसा ही पंडाल मंच पर भी लगा था जहां से माननीय मुख्यमंत्री और गणमान्य जन प्रतिनिधि जनता को संबोधित करने वाले थे ।सुचारू आयोजन व्यवस्था हेतु सभी विभागों के अधिकारी, कर्मचारी गण की उपस्थिति अनिवार्य थी।
बरसात रात से ही हो रही थी, पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था, इसी बीच सभी विभागों को अपनी अपनी तैयारियां न केवल पूरी करनी थी बल्कि आयोजन को सफल बनाने के लिए भीड़ भी जुटानी थी। सभी विभागों के अधिकारी कर्मचारी पूर्ण तन्मयता के साथ आयोजन को सफल बनाने में समर्पित भाव से लगे हुए थे।,इतने में ही एक पंडाल में जिसमें कुछ कुर्सियां खाली भी थी, एक अधेड़ महिला ने अपने आप को वर्षा से भीगने से बचाते हुए प्रवेश किया वह किनारे से कुछ हटकर खड़ी हो गई । उस पंडाल के विभागीय अधिकारी ने विनम्रता पूर्वक उससे कहा कृपया आप कुर्सी ले लें! आप किस विभाग से हैं? अरे देखो तो ! पानी तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा ।
इतना सुनते ही वह महिला फट पड़ी मानो उसकी सब्र का बांध टूट गया हो। कहने लगी भैया!जब अपने ही अपने नहीं हुए तो दूसरों से क्या आज कहूँ?किसको दोष दूँ। उसके ऐसा कहने पर, उस अधिकारी ने जिसने उस महिला को कुर्सी ले बैठने को कहा था कुछ सोचते हुए कहा। क्या मैंने आपसे कुछ गलत कह दिया? महिला बोली नहीं भैया! खोट तो मेरी तकदीर का ही है जिससे यह स्थिति बनी और वह अपनी ही रौ में आ कहने लगी ..... मेरे पिता पुलिस में अधिकारी रहे उन्होंने मेरी शादी शिक्षा विभाग में व्याख्याता के पद पर कार्यरत सुयोग्य व व्यवहार कुशल लड़के को देखकर कर दी। सब कुछ ठीक चल रहा था मैं सुंदर तो थी पर पढ़ाई में ज्यादा ठीक नहीं थी, घर का सारा काम मुझे आता पर सरस्वती सिद्ध नहीं हो सकी थी मैं दसवीं कक्षा भी पास नहीं कर सकी थी 18 वर्ष से होते ही मेरी शादी हो गई फिर तो घर गृहस्ती में ऐसी उलझी कि वक्त कब पंख लगा उड़ गया, पता ही नहीं चला। मेरे भाई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं पर मेरे पति की हृदयाघात से मृत्यु होने पर भी जब बेअपनी व्यस्तताओं का हवाला देकर नहीं आए तब उसी दिन मैंने अपने मायके को तिलांजलि दे दी। तब मेरा बड़ा बेटा 8 वर्ष का छोटा 5 वर्ष का था मुझे सरकार की कृपा से मेरी शिक्षा अनुरूप चपरासी के पद पर नियुक्ति मिली थी ।मैंने भी अपने बच्चों के भविष्य को बनाने की ठान ली थी। दिन में नौकरी करती शाम को सिलाई मशीन रख सिलाई कर कुछ और आय बढ़ा जीवननिर्वाह करती। मेरी साधना तब रंग लाई जब बड़ा बेटा आईएएस परीक्षा में सफल हुआ और छोटा आर्मी में कमीशंड ऑफीसर बना। मेरी मनोकामना पूरी हुई थी सच में बहुत खुश थी अपनी साधना को सफल होता देख। दोनों बच्चों के विवाह कर मानो मैं गंगा नहा ली थी। बेटे अपनी अपनी बहुओं के साथ अपनी पदस्थापना की जगहों पर थे.. यह कहते-कहते महिला का स्वर बोझिल होने लगा ,पर थोड़ा रूक गहरी सांस ले वह पुनः अपनी रौ में बहने लगी थी और बोली। भैया! कल बड़े बेटे का यहां घर आना हुआ था वह वरिष्ठ आईएएस अधिकारी होकर शासन में पदस्थ है फल स्वरुप सुबह से ही शहर के लोगों का उससे मिलने आने का तांता लगा हुआ था, और में अनुकंपा नियुक्ति की शिक्षा विभाग की चपरासिन मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में लगी अपनी ड्यूटी पर पहुंचने को चिंतित थी। पानी रूक नहीं रहा था आखिर मैंने अपने बेटे से कहा कि यह जो लाल पीली बत्तियों की गाड़ियां आ जा रही हैं, क्या मुझे उनमें से किसी एक से मुख्यमंत्री के कार्यक्रम स्थल पर छुडवा दोगे?!
बेटे ने सुना, और तुनक कर बोला मां! देखो अब आपको यह चपरासीगीरी करने की कोई जरूरत नहीं है आपको मैंने पहले भी कहा है और तुम्हारी बहू भी कहती ही रही हैं, कि यह नौकरी तत्काल छोड़ दो ,और आप हमारे साथ आकर रहो। पर आप तो हमारी *नाक कटवाने* पर तुली हैं आखिर लोग कहें कैसे लड़के तो इतने बड़े अधिकारी हैं और देखो उनकी मां चपरासीगीरी कर अपना जीवन पाल रही है। पर भैया! मैंने भी उनसे कह दिया यह चपरासिन की ही साधना है जिसने तुम्हें अधिकारी बनाया है और तुम्हारा अधिकारी होने का दंभ ही चपरासिन को भी उसकी कर्तव्य से विरत करना चाहता है। तुम चाहते हो कि मैं अपनी नौकरी छोड़ बहुओं के मर्जी के अधीन रहूं तो मैं ऐसा हरगिज नहीं करूंगी। यह कह मै भारी वर्षा में भी ओटो रिक्शा कर यहां चली आई हूं। क्या मैं अपने पति की पुण्य साधना की अनुकंपा नियुक्ति को छोड़, उनकी घर में रची बसी यादों को भूल, अपने स्वयं की संतुष्टि को त्याग जा सकती हूं भैया! क्या मुझे जाना चाहिए? एक लंबी चुप्पी वातावरण में छा गई थी.... उसने कुछ देर चुप रह फिर कहा सूनो! मैंने मना कर दिया ,और अपने काम पर आ गई हूंं,और अब अपनी विभाग के पंडाल पर जा रही हूं, बैठूंगी नहीं। यह कहकर वह अधेड़ महिला अचानक भीड़ में, कहाँ गुम हो गई?
पंडाल में बैठे लोग देखते ही रह गये। किन्तु उसके प्रश्न वातावरण में जरूर तैर रहे थे, कि *जब चपरासिन की साधना पुत्रों को अधिकारी बना सकती है तब उस अधिकारी की नाक चपरासिन का पुत्र होने से कैसे कट सकती है ?*
राज किशोर वाजपेयी"अभय
*मोबाइल :9425 00 3616*
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