निःस्वादों के स्वाद परखते
हम बरखा का रुदन देखते
प्रकृति का प्रस्फुटन लेखते।
भाव अभ्युदय अभिलाषी हैं
निग्रह योग्य नहीं हो सकते ।।
गीत हमारे, वनवासी हैं ।।
विक्रय योग्य नहीं हो सकते.....
अंतर-मन को, गाने वाले
कल्पित अक्स बनाने वाले
पंच-भूत को प्राण मानकर
निराकार को ,ध्याने वाले ।
बोल अमूर्त आभासी हैं जो
विग्रह योग्य नहीं हो सकते
गीत हमारे ,वनवासी हैं ।।
विक्रय योग्य नहीं हो सकते....
डॉ. राधाशर्मा..
9770221699
Social Plugin