*साहित्य सरोज पत्रिका का साप्ताहिक लेखन प्रतियोगिता '01*
अनुभव तिवारी
दो कदम तुम भी चलो दो कदम हम भी बढे
गुनगुना ले गीत मन मे शब्द कुछ मन मे गढे
व्यक्त ना कर पाए कुछ भी अव्यक्त सी हो भावना
चुप रहे अपने अधर बस नैन ही सब कुछ कहे
कब किसे कितना मिलेगा कह नही सकते यहाँ
जो मिला है बस उसी के साथ हम बहते रहे
चंद पल की जिंदगी है आंसू बहाना छोड दे
पत्थरो मे भी खुशी के गीत लिखते चल पडे
चांद ही सबकुछ नही गर उजाला चाहिए
बनके लौ हर दीये मे रौशनी भरते चले।
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