पुस्तक समीक्षा : भारतीय ज्ञान प्रणाली : समीक्षक : डॉ. प्रिया सूफी

 पुस्तक समीक्षा : 

भारतीय ज्ञान प्रणाली 

• डॉ. श्रीकृष्ण "जुगनू"

प्रकाशक : आर्यावर्त संस्कृति संस्थान, दयालपुर, दिल्ली 

पृष्ठ : 432

मूल्य : 900 रुपये

प्रथम संस्करण 2026

समीक्षक : डॉ. प्रिया सूफी 

( होशियारपुर)

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भारतीय ज्ञान परंपरा कई अर्थों में सौभाग्यशाली है कि उसे महर्षि अगस्त्य, पराशर, गर्ग, सुश्रुत एवं चरक, चाणक्य जैसे महान चिंतकों का ज्ञानात्मक अवदान मिला है। आचार्य श्रीकृष्ण " जुगनू " के शब्दों में ज्ञान अनुभव से सृजित होता है और प्रशिक्षण अथवा प्रत्यक्ष प्रदर्शन से आचरण में लाया जाता है। काश्यप, वराहमिहिर, वशिष्ठ, गार्गेय और बृहस्पति आदि की संहिताओं से प्राप्त ज्ञान की विभिन्न शाखाएं, प्रशाखाएं जिन ग्रंथों के लिए प्रेरणास्रोत बनी, उनकी परंपरा रामराजा, भोजदेव, बल्लालसेन और राणा कुम्भा तक फलीभूत हुई। और, इन्हीं की ठोस नींव पर पद्धतिमूलक आयुर्वेद, शिल्पवेद, गंधर्ववेद और वृक्षायुर्वेद, धातु शास्त्र, लोहप्रदीप, सामुद्रिक शास्त्र, नाट्य शास्त्र आदि ग्रंथों का निर्माण हुआ। ये ही ग्रन्थ अन्य उपवेदों की आधार भूमि का निर्माण करते हैं। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद और स्थापत्य वेद के अंतर्गत सैंकड़ों ऐसे ग्रन्थ उपलब्ध हैं जो विषयों की असंख्य कोटियाँ प्रदान कर भारतीय ज्ञान प्रणाली की समृद्ध करते हैं। ध्यातव्य है कि जब शास्त्र और विषय ज्ञान की सीमाओं से परे चले जाते हैं तो वह आध्यात्मिक प्रभामंडल का निर्माण करते हैं जिनके दिव्य प्रकाश में हम अपने अतीत की भव्यता और ज्ञानात्मक उपलब्धतता को सही अर्थों में देख, समझ पाते हैं।


विश्व में भारत जिस मौलिक चिंतन और प्रगल्भ विचारधारा को लेकर प्रभावी और आकर्षक बना रहा है, उसी सर्वोपयोगी ज्ञान संपदा को कंठकोश से लेकर पत्रकोश तक अक्षर अक्षर संरक्षित एवं संहिताबद्ध कर सुरक्षित रखने का प्रयास पुरातन ऋषियों - मुनियों से लेकर आधुनिक मनीषियों तक ने पूरे मनोयोग एवं संपूर्ण निष्ठा से किया है। जिनमें से एक ध्रुव नक्षत्र, स्वनामधन्य आचार्य डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू हैं जो लगभग तीस वर्षों से भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न विषयों की न केवल खोजबीन कर रहे हैं अपितु उन्हें उनकी संपूर्ण भव्यता के साथ लिपिबद्ध भी कर रहे हैं। 

भारतीय ज्ञान प्रणाली उनके द्वारा लिखित, सूचीबद्ध एवं शोधबद्ध विषयों का व्याख्यायित, संगृहीत दस्तावेज है जिसमें धनुर्वेद, पंचमवेद, अर्थशास्त्र, स्थापत्य, कामशास्त्र, गणित, भूगोल, इतिहास, पुराण,  तंत्र, वृक्ष, कृषि, धातु, अलंकरण, चित्र एवं कोश सभी बृहद विषयों को समेटने का श्रमसाध्य प्रयास किया गया है। सभी विषयों का शोधपरक अध्ययन पठन पाठन एवं लिपिबद्ध करना अपने आप में महती एवं कठिन कार्य है जिसका इस पुस्तक में सहजता से निर्वाह किया गया है। इसमें कुल चौबीस अध्याय हैं। वेदों से प्रारंभ कर रासो तक सभी चौबीस विषयों का सार तत्व प्रस्तुत करना और बेहद बृहद विषयों को कुछ पन्नों में समेटना निस्संदेह एक दुरूह कार्य है, जिसे आचार्य श्री जुगनू जी संपूर्ण दक्षता एवं विशिष्टता से करते हैं। प्रथम अध्याय वेदों के मंत्रगान में निहित प्रार्थनाएं, स्मरणीय देवता, मंत्र गान के रहस्यमय दिव्य प्रयोग, सूक्तों के गायन से उत्कीर्ण भाव तरंगों से उपलब्ध ध्यान और साधना की आत्मस्थ लीनता की बात रखता है।

इसके बाद, आयुर्वेद विषय में स्वास्थ्य साधना हेतु लक्षण, परीक्षण, निदान और चिकित्सोपाय आदि का विशद् विवेचन किया गया है। परन्तु, यहां बात केवल मानव चिकित्सा की ही नहीं है। भारतीय परंपरा गज, अश्व इत्यादि अन्य जीव जंतुओं के लिए भी उतनी ही उदार है। इसीलिए भारतीय चिकित्सा शास्त्र में केवल मानव चिकित्सा ही नहीं, अश्वायुर्वेद, हत्यायुर्वेद, गवायुर्वेद, गजायुर्वेद, उष्ट्रायुर्वद इत्यादि कई प्रशाखाएं उपलब्ध हैं जो प्राणिमात्र के लिए मानवता के संदेश से आगे बढ़ कर उनके स्वास्थ्य की चिंता और चिकित्सा भी प्रस्तुत करता है।

इसके बाद धनुर्वेद का विवरण काटने, छीलने व छेद करने वाले पाषाणकालीन उपकरणों के पुरावशेषों से आरम्भ कर धातु के आयुध और यंत्रों देने के साथ साथ आर्यों तथा अनार्यों के संघर्ष और युद्धकला की संक्षिप्त सारगर्भित जानकारी प्रस्तुत करता है। अस्त्रमुक्त, पाणिमुक्त, मुक्तसंधारित, अयुक्त तथा बाहुयुक्त आदि पुराण अस्त्रों की कोटियां, योद्धाओं के लिए लोहजाल, लोहकवच, सूत्रकंटक आदि सुरक्षा आवरणों का वर्णन प्राचीन ग्रंथों, अभिलेखों तथा प्रशस्तियों के संदर्भगत विवेचन के साथ बहुत कुछ ऐसा भी है जो प्राचीन भारतीय युद्धकला का सांगोपांग  वर्णन करता है।गान्धर्ववेद पुराणकाल से गंधर्वों का परिचय, संगीत के स्वर, ग्राम और मूर्च्छनाओं के विवरण, स्वर मण्डल के स्वरूप, पर पर्वतीय संगीत और सामगान, पुराणों में दुर्लभ गेय स्तोत्रों के भण्डार, सगीत एवं अन्यान्य के लक्षण प्रस्तुत करता है। 


पंचमवेद लोक की महिमा का अद्भुत व्याख्यान है। जो नाट्यशास्त्र को अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य रखता है। इस अभिव्यक्ति के लिए लोक भाषा साधन स्वरूप प्रस्तुत होती है। लोक भाषा होने के कारण प्राकृत नाटकों केमध्यम से कालजयी हो गई। नाटकों में गवरी का महत्व और नाट्य विरासत आत्मस्थ और परात्मस्थ सौंदर्यानुभूति, संगीतमय प्रस्तुतियां सभी पंचमवेद के रूप में अपना महत्व सिद्ध करती हैं।अर्थशास्त्र जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है यह राजधर्म और नीति का संधारक है। इसकी विभाजित विद्याएँ चार हैं। दण्ड स्वरूप ग्रंथों का निरूपण, राजधर्म के विषय, चाणक्य के स्रोत, कौटिल्य अर्थशास्त्र का व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक पक्ष, चाणक्य सूत्र, चाणक्य का ज्योतिष विषयक ज्ञान, दंड नीति आदि सभी का विवेचन इस अध्याय में वर्णित है।


स्थापत्य वेद वैदिक कालीन वास्तु की परिकल्पना से आरम्भ हो कर बौद्ध कालीन वास्तु विचार, विश्वकर्मीय मत, चरकसंहिता की वास्तु विद्या, गर्ग संहिता, बृहत्संहिता और काश्यपसंहिता के उद्धरण देते हुए वास्तु के अर्थ, परंपरा और प्रवृत्तियों और विश्वकर्मा प्रोक्त ग्रंथों और अन्य वास्तु विषयक ग्रंथों का सांगोपांग स्पष्टीकरण देता है। कामशास्त्र अध्याय वात्स्यायन कृत कामशास्त्र की टीकाओं के साथ ज्ञानात्मक विषयों की सूची, अन्य सभी कलाओं के संदर्भ में काम की प्रेरणा तत्व रूपी भूमिका और काम शिल्प के दार्शनिक संदर्भों का ज़िक्र प्रस्तुत करता है।

ऐसे ही अनेक विषय और अनुशासनो पर इस पुस्तक में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक की समृद्धि इस अर्थ में अधिक है कि जितने विवरण, उतनी ही सन्दर्भों वाली पाद टिप्पणियां हैं। चौंकाने वाली बात यह भी है कि अधिकांश विषयों के ग्रंथ स्वयं जुगनू जी के हैं और अधिकांश पांडुलिपियों के रूप में थे। उनको तैयार किया और उनकी भूमिकाएं लिखीं तो एक एक विषय की आधारभूमि भी उजागर हुई। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि धर्म आचरण का और ज्ञान विवेक का विषय है। भारतीय पाठकों को उदारता से इस गौरवशाली ग्रंथ का पाठन करना चाहिए।