बस स्‍टैंड-अलका

बहुत देर से मैं बस स्टांप पर खड़ी बस का इंतज़ार कर रही थी बस को आज पता नहीं क्या हो गया था , आने का नाम ही नहीं , गर्मी में बुरा हाल , पवन ने भी चलना बंद कर दिया था मानो दोपहर में विश्राम करने चली गई हो , मैं पसीना पोछ पोछ कर परेशान थी सारे पेड भी जैसे सो रहे थे ज़रा भी हिल डुल नहीं रहे थे , मेरी बग़ल मे बहुत से यात्री थे परन्तु एक परिवार के कई लोग थे पर एक लड़का और एक लड़की वो बडी अजीबो ग़रीब हरकतें कर रहें थे व बहुत बाते भी आँखों से इशारे मुझेबस का बेसब्री से इंतज़ार था परन्तु आज उसने देर से आने की ठान ली थी। मैंने बोरीयत मिटाने के लिये उस परिवार पर ध्यान केन्द्रित किया तोसमझ में आया कि एक साथ कई पिढियां सफर कर रही है ।
दादी .दादा ,माँ ,बापू . बेटा ,बहू शायद नई नई ही शादी के बंधनमें बँधे थे ,बेटा अपनी पत्नी को बहुत इशारे करता कमेंट कर रहा था जो भी लोग निकलते बह कुछ न बोलता और पत्नी को देखता पत्नी भी प्यार भरी नजर डाल मुस्करा देती बस स्टांप पर धीरे धीरे भीड़ बढती जा रही थी । लग रहा था बस आई भी तो चढ़ना मुश्किल इतनी भीड़ पर क्या किया जा सकता है सफ़र भी लम्बा करना था , रिक्शा कर नहीं सकती थी बस का ही इंतज़ार करना पड़ेगा मन को समझाया किसी तरह और फिर उस नव विवाहित जोड़े की तरफ़ ध्यान देकर बोरियत मिटाने लगी ।
बह लड़का जो भी ट्रक जाता उसके पीछे लिखे स्लोगन पढता वह भी ज़ोर से ताकी सब सुने व प्रतिक्रिया दे।  कुछ रोमांटिक बात होती तो पत्नी की तरफ़ देखकर ज़ोर ज़ोर से बोलता  बहू घुंघट थोड़ा सा उठाती नीचे का होंठ दाँतो तले दबाती सबकी नज़रें बचा कर और आंखे पति की तरफ तरैरती , पति को पत्नी की यह भाव भगीमा बहुत रोमांचित करती उसे पढने से ज्यादा पत्नी के हाव भाव में मज़ा आ रहा था वह अब बस के इंतज़ार का मज़ा ले रहा था !
तभी मार्बल से लदा एक ट्रक आया जो ओवरलोड की वजह से बहुत आहिस्ता आहिस्ता चल रहा था थोड़ा थोड़ा बोझ से दबा दबा कराहता हुआ पीछे देखा तो लिखा था (परिवार की लाड़ली ) बेटे ने कहाँ देखो देखो परिवार की लाड़ली जा रही है इसकी मस्तानी अदाओ को देखो चाल पर गौर फ़रमाएँ क्या नजाकत है चाल में शरीर इतना भारी भरकम और चाल उफ़ ओ माँ साथ ही साथी ,बड़े प्यार से पत्नी को निहारा हुंह इतना तो बोझ लाद रखा है ऊपर से घुघट और परिवार की लाड़ली ,क्या मज़ाक़ बनाया है पत्नी ने व्यंग्य किया ।
सासु जो बहुत समय से सब देख सुन रही थी इस बात पर बोलने से पहले अपने पति व साँस पर नजर डाल बोली इतना बोझा लाद रखा है तभी तो परिवार की लाड़ली है वरना यह बोझा न ढोती तो आज यहाँ न होती मैं भी बडे अरमान लेकर आई थी इस घर में पर घर की ज़िम्मेदारीयों ने ऐसा जकड़ा की जकड़ती ही चली गई लाड़ली काहे की लाड़ली पुरे घर की परिचारिका बनकर रह गई कब बुढी हो गई पता नहीं चला और पता नहीं क्या क्या कहती जा रही थी अचानक मैने महसूस किया की साँस की आवाज़ इतना बोल घुट कर रह गई थी।
मेरी नज़र उसकी सास पर टीका की टीकी रह गई वह आँख निकाल कर खा जाने वाली नज़रों से अपनी बहू को घूर रही थी ..
तभी बस आ गई का शोर सुन सब बस में चढ़ने की जद्दो जहद में लग गये आख़िर मैंने भी यह जंग जीत ही ली और खिड़की पास खड़े होने की जगह पा गई अरे ये क्या मैंने जहां की टीकट ली वहीं की उन लोगों ने भी मैंने कहाँ आप वहाँ किसी से मिलने जा रहे हो अरे नहीं बहन हमारा घर है , यहाँ तो हमारे छोरे की ससुराल है बहू को मिलवाने लेकर आये थे। हम रहते बोनकोडे में है मैंने कहाँ मैं भी ग्यारह नम्बर सेक्टर में , ऐसा क्या हम लोग दस नम्बर में बस बात करते करते किधर दो घंटे बीत गये पता नहीं चला । कई दिन बाद सब्ज़ी वाले के पास मुझे  वहीं ताई मिल गई। मैंने पूछा कैसी हो , सब ठीक है न क्या बताऊँ बहन चालिस - पैंतालीस , साल हो गये शादी हो कर आई थी तब से एक दिन भी आराम नहीं पाई ।सोचा था बहू आयेगी तो थोड़ा 
आराम मिलेगा पर कहाँ मेरी सासू माँ को आज भी सब मेरे हाथ का ही चाहिए , सारा दिन गाली भी मुझको देती है , पर काम भी मेरे हाथ का साली मेरी तो जिदंगी ही बेकार है ज़रा भी सुख नहीं है नसीब में मैंने प्यार से कहाँ कोई बात नहीं  आंटी माँ जी आप को बहुत प्यार करती होगी। काहे का प्यार मैंने कहाँ यही मेरा घर है चलो चाय पिलाती हूँ मसाले वाली चलो मुझे भी चाय पीने का मन हो रहा था । हम लोग बात करते करते घर आ गये मैंने चाय रखी व नाश्ता व चाय ले कर बैठक में आ गई अरे तुम्हारा नाम क्या है? मैंने पूछा ही नहीं “ मैं ने कहाँ रेनू ।और आपका “उन्होंने कहाँ “गोदावरी “ मैंने कहाँ बहुत पावन  नाम है हाँ नाम ही नाम है जीवन भी नदी की तरह सब दुख , दर्द उदर में समाते जाओ और चेहरे पर हंसी सजाते रहो अरे गोदावरी आंटी चाय पीए हाँ  हाँ बहन और वो चाय पीने लगी।
 मैंने देखा उनके चेहरे पर काफ़ी चिंताएं झलक रही थी तो मैंने पूछा गोदावरी आंटी आप अंदर से बहूत दुःख भी हैं क्या बात है क्या आप मुझे बता सकती हैं उन्होंने लम्बी गहरी साँस ली और कहा आज मेरी भी तुम्हारे जैसी 1 बेटी होती तो मेरा भी । वह मेरा भी हाल चाल लेती मैंने पूछा क्या हुआ था तो  वह जोर और जोर ओर से रोते हुए बोलीं क्या बताऊँ बहेन यह मेरी माँ जी है न इन्होंनेबेटी  आने पर मेरा  गर्भपात करा दिया था उन्हे  सिर्फ़ और सिर्फ़ लडका ही चाहिए था मैंने बहूत  विरोध किया और बहुत मिन्नतें भी की मेरा रोने धोने पर भी माज़ी को कोई असर नही हुआ और उन्होंने ज़बरदस्ती मेरा गर्भपात करा दिया , तभी से मुझे घर के सभी लोगों से नफ़रत सी हो गई है पर मजबूरी है कहाँ जाऊँ बेटा पढ़ी लिखी नहीं हूँ इसलिए इस घर में पडी हूँ और घर का काम कर सब की जी हुज़ूरी कर जीवन काट रही हूँ आप तो बस मौत का इंतज़ार है मैंने कहा माँ आप दिल छोटा न करें आज से मैं आपकी बेटी हूँ आपको जो भी तक़लीफ हो उसे मुझसे  कहें मैं पूरा करूँगी जब दिल करे आप मेरे पास आ जाए और मन करे तो कई दिन रहकर भी चली जाए , मुझे अच्छा लगेगा उन्होंने मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरा और कहा आज का दिन मेरे लिए बेहद यादगार है मैं फिर आऊँगी कह कर मुझे आशीर्वाद देकर वो चली गई उनके जाने के बाद मैं सोचती रही क्या आज  भी ऐसा होता है एक औरत ही एक औरत का जीवन उसके आने के पहले ही ले लेती है नहीं नहीं मैं ज़रूर इसके लिए कुछ करूँगी और मैंने प्रण लिया कि आज के बाद मैं भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ आंदोलन खड़ा करूँगी और माज़ी को गोदावरी आंटी  को साथ लेकर उनके घावों को मल्लहम जरुर लगाऊँगी।
बस स्टेंड का वह सीन मेरी आँखों में घूम गया कि कैसे गोदावरी आंटी बोलते बोलते उनकी आवाज़ का दम घुटने लगा था , क्योंकि उनके दिल में माजी की दहशत समाई है और इसी दहशत को मुझे निकालना है और गोदावरी आंटी को 1 आज़ादी की ज़िंदगी और बेख़ौफ़ साँसें लेने का हक़ दिलाना है शायद वही कारण  होगा कि उस दिन बस बहुत देर बाद आयी और मुझे गोदावरी आंटी को मिलाना था एक मक़सद जीवन का दिया मैं उस घड़ी की आज शुक्रगुज़ार हूँ कि मुझे भी जीवन में एक मक़सद मिला, ईश्वर भी क्या क्या खेल खिलाता है किसको कहाँ मिला दें या वही जानता है।मैंने ऊपरवाला का शुक्रियादा किया और अपने आप को मैं योजनाओं में व्यस्त कर एक सुकून सा महसूस करने लगी लगा अब मेरी यह ज़िंदगी सार्थक हुई और सचमुच जीवन का कुछ फ़ायदा लोगों को दे पाऊंगी मेरा जीवन सार्थक होगा।



डॉ अलका पाण्डेय -मुम्बई -9920899214