मेरी पहली र‍ेलयात्रा-अलका

अप्रैल  के महीने में मेरी छटी कक्षा के पेपर समाप्त हो गए तथा उसके बाद दो महीने की मेरी दो महीने की छुट्टियाँ शुरू हो गई। जब मेरे विद्यालय में गर्मियों की छुट्टियाँ हुई तो मेरीअम्मां  ने कहाँ हमें हमारे गाँव चलना  है।तुम सब लोग अपने कपड़े निकाल लो क्या क्या ले जाना है और वहाँ शराफ़त से रहना हमारी नाक मत कटाना गाँव में।
 मेरे दादाजी तथा दादीजी रहते हैं। पहले वहाँ मैं कब गई कुछ याद नहीं है अपने होश में मेरी यह पहली यात्रा होने वाली  थी वह भी रेल से  मुझे सोच कर ही आनंद आ गया। तथा हमने रेल यात्रा करने की योजना बनाई क्योंकि मैं पहली बार रेल यात्रा कर रही थी इसलिए यह मेरे लिए बहुत रोचक था तथा मेरे अंदर उत्साह भी बहुत था । 
मां ने शाम को ही सारे सामान की पैकिंग कर ली थी. रेल रात के 3:00 बजे की थी. मां ने कहा तुम जाकर सो जाओ लेकिन मुझे नींद कहां आने वाली थी मैं पूरी रात भर यही सोच रही थी कि रेल का सफर कैसा होगा. जैसे-तैसे रात के 2:00 बजे और मां ने मुझे उठाया और कहा कि तैयार हो जाओ रेलवे स्टेशन जाने का समय हो गया है।
मैं हाथ मुंह धो कर तैयार हो गयी और पिताजी ने घर के बाहर टैक्सी बुला ली. घर के बाहर निकलें तो देखा कि गर्मी बहुत थी और उमस भी हम टैक्सी में बैठ कर करीब 2:30 बजे इंदौर स्टेशन पहुंचे. पिताजी ने पहले ही ट्रेन की टिकट बुक करा ली थी.
स्टेशन पर जहाँ भी देखो वहीं लोग अपना बैग उठाए जा रहे थे। वहाँ टिकट की खिड़की पर बहुत भीड़ थी  वहाँ स्टेशन पर कई लोग टिकट ले रहे थे। कोई रेल का जानकारी ले रहा था तो कोई उनकी समय सारणी देख रहा था। स्टेशन पर जगह-जगह पानी व पुस्तक पत्रिकाओं तथा खाने के स्टाल लगे हुए थे। कुली इधर से उधर सामान लेकर जा रहे थे।
स्टेशन पहुंचने के बाद हम प्लेटफॉर्म पर बैठे हुए थे वहां पर मैंने देखा कि एक ट्रेन आ रही थी तो एक ट्रेन जा रही थी. वहां पर लोगों की बहुत ज्यादा भीड़ थी. रेल की सीटी इतनी जोरदार थी कि उसको 5 किलोमीटर दूर तक सुना जा सकता था
हम भी सामान लेकर वहाँ स्टेशन पर बैठे थे तथा रेल आने का इंतज़ार कर रहे थे , तभी पांच मिनट बाद हमारी रेल आ गई। उसके बाद हम रेल में चढ़ गए तथा अपनी सीट पर बैठ गए। रेल के अंदर बहुत भीड़ थी। कोई किताब पढ़ रहा था कोई कुछ खा रहा था। हमारे साथ वाली सीट पर एक छोटा बच्चा रो रहा था। 
कुछ देर तक हम ट्रेन में बैठे रहे. मैं ट्रेन की खिड़की से बाहर झांक रही थी मैंने देखा कि एक आदमी काला कोट पहने ट्रेन को हरी झंडी दिखा रहा है. अब मैंने कोतूहल वश पिताजी से पूछा कि वह आदमी ट्रेन को हरी झंडी क्यों दिखा रहे हैं तो पिताजी ने कहा कि यह ट्रेन के ड्राइवर को ट्रेन चलाने का संकेत है उसी समय ट्रेन धीरे धीरे चलने लगी और ट्रेन से बहुत तेज सिटी की आवाज भी आ रही उसके बाद सिगनल हुआ और रेल चल पड़ी। कुछ ही देर में रेल तेज गति से चलने लगी। मैं खिड़की के पास बैठी थी वहाँ से देखने पर लग रहा था कि मानो पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सभी भाग रहे हों। मुझे रेल में बड़ा आनन्द आ रहा था। 
ऐसा लग रहा था मानो मैं झूला झूल रही हूँ। मैं बहुत आनंद ले रही थी तभी अम्माँ बोली सो जाओ  जाओ कुछ खाना हो तो खा लो , मैंने कहाँ पूरी भांजी दे दो रेल में खाना खाने का भी कुछ अलग ही मज़ा आ रहा था ! खाना खा कर मैं लेट गयी ..
थोड़ी देर में ही मुझे नींद आ गई। जब आँख खुली तो  अम्माँ कहने लगी तुम तो सोती ही रही शाम हो गई कानपुर आने ही वाला है वहा  तुम्हारे मामा आयेंगे लेने व हमें राम नगर छोड़ेंगे हम दादा दादी के पास एक महिने रह कर मामा के पास चलेंगे कानपुर स्टेशन आ गया हम उतर गये रेल से मुन्नन मामा ने हमारा समान लिया व जीप में हमें बैठा कर रामनगर दादा के घर छोड़ा बहुत मज़ेदार थी मेरी पहली रेल यात्रा।

डॉ अलका पाण्डेय