तुझे देख मन में क्यूँ उम्मीद थी जगी।
मासूस सी कोई इक कली थी खिली ।
तेरी खुशबू से आलम सारा मदहोश हो गया।
बाग में ये कैसा ,क्यों हादसा हो गया ।
बागवाँ को ही तुझसे प्यार हो गया।
आँखों में सबके ईर्ष्या क्यों थी जगी।
मासूम सी कोई इक कली थी खिली।
सुर्ख रंग ओ'आब देख चमन डर गया.
भँवरों का बाग में आना जाना बढ़ गया।
मलयज भी तूझे देख बहक सा गया।
गंध तेरी चुरा के देखो वायु भी चली ।
मासूम सी कोई इक कली थी खिली।
प्रेम का तू तोहफा न्यारा है बना
तेरे कदमों में सारा जहाँ है झुका।
सुमनों बीच तेरी हुकुमत ही रही।
रे गुलाब , जज्बात में साथ तू मिली
मासूम सी कोई इक कली थी खिली
मनोरमा जैन पाखी
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