भिंडी की भुजिया -मनोरमा


"परेशान हो गया वही लौकी ,तोरई खाते खाते ।आफिस में देखो ,दोस्तों के टिफिन.में कुछ न कुछ नया व टेस्टी होता है।""आपको तो घर का कुछ भाता ही नहीं ,चाहे कितने जतन करूँ!लोग ऊँगली चाट जाते हैं पर आपको सदैव कमियाँ निकालनी होती हैं।" आज रानी का गुस्सा फट पड़ा। सुबह से उठकर घर के काम ,फिर सब्जी मार्केट ,किराना मार्केट के चक्कर ।थक जाती थी रानी ।मदद करने के लिए कोई नहीं ।और चारों की फर्माइशें और शौक अलग। रमन भुनभुनाते बिना टिफिन लिए निकल गये।
काम से निबट रानी सब्जी मार्केट गयी ।ताजी नरम भिंडी और कच्ची अमिया देख उसकी आँखें खिल गयीं।  "खाना बनाया हो तो परोस दो नहीं तो  बाजार में खाकर आऊँ।"रमन का गुस्सा कम न हुआ था ।
हाथ मुँह धोकर जैसे ही खाने की प्लेट देखी , मानों भूख तेज हो गयी हो। भरवाँ भिंडी , अमिया का शीरा और पूरी । आज काफी दिन बाद जायका बदला। कुछ ज्यादा ही खा गया। रानी की ओर देखते उन्हें सुबह की बात याद आ गयी। "अरे यार, सॉरी , वो ऑफिस का गुस्सा तुम पर निकल गया था सुबह। टिफिन भी न ले गया तो सभी तुम्हारे बनाये भोजन को मिस कर रहे थे। "
रानी की आँखें संतुष्ठि से चमक उठी थी।



मनोरमा जैन पाखी