गुलाब से सीखो यदि जीना है जीवन में,
कितने ही शूल छुपाए रखता है मन में।
देख तीव्र वेग पवन नहीं घबराता है,
मानव को भी जीने का पाठ पढ़ाता है।
विपत्ति में भी जारी मुस्कान रखता है,
कण्टकों में भी अपनी पहचान रखता है।
बाला के गले का सुंदर हार बनता है,
शाख से जुदा होकर भी श्रंगार बनता है।
प्रेमिका के लिए सुगन्धित उपहार बनता है,
नव यौवना का गजरा, श्रृंगार बनता है।
यदि डाली पर आनन्दित और हर्षित होता है,
देवता के चरणों में भी अर्पित होता है।
भ्रमर को उसका आवाम देता है,
मानव को जीने का पैगाम देता है।
गुलाब से सीखो यदि जीना है जीवन में,
कितने ही शूल बिंधे रखता है तन में.
..
प्रीति चौधरी "मनोरमा"
जनपद बुलन्दशहर
उत्तरप्रदेश
स्वरचित एवं अप्रकाशित
Social Plugin