आज हमारा बालक बचपन जीना भूल गया है। बचपन की वह मासूम अठखेलियां, वह शैतानियां, वह खेल- खिलौने न जाने कहां खो गए हैं? हमारा बालक टीवी, लैपटॉप व मोबाइल जैसी मशीनों का आदि हो गया है। मोबाइल की तो जैसे उसे लत लग चुकी है ।यदि उसे 'मोबाइल एडिक्ट 'कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
किंतु विचारणीय विषय यह है कि इन सब के पीछे जिम्मेदार कौन है? आखिर किसका उत्तरदायित्व है? जी हां मैं आपका ध्यान इंगित करना चाहती हूं अभिभावकों की ओर ।आज की पीढ़ी में हम अपने बच्चे को अच्छी से अच्छी शिक्षा और अच्छे से अच्छा भोजन उपलब्ध कराते हैं। किंतु उनके मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने में असमर्थ हो जाते हैं ।प्राचीन काल में जब संयुक्त परिवार होते थे तो हमारे बालक का मानसिक स्वास्थ्य एकदम सही होता था। बच्चे परिवारों में बुजुर्गों के पास कहानियां सुनते थे ।आपस में भी बच्चे एक साथ खाना खाते थे, खेलते थे, तो उनका सामाजिक विकास भी उत्तम होता था। किंतु आजकल संयुक्त परिवार कम ही देखने को मिलते हैं। और संयुक्त परिवार का रूप एकाकी परिवार ने ले लिया है। इस एकाकी परिवार में भी माता-पिता दोनों जब नौकरी पेशा होते हैं, तब बच्चे के समक्ष अधिक समस्याएं पेश आती हैं ।और बच्चे को बचपन से ही क्रश, फिर प्ले स्कूल में भेज दिया जाता है। बच्चे अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं ।और इस अकेलेपन के लिए अभिभावक ही उत्तरदाई हैं ।हम अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर लेते हैं। किंतु यह सही नहीं है। हमें बालक को अपना समय भी देना चाहिए ।जब थोड़ा बहुत समय रात को बच्चा हमसे लेना चाहता है, तो हम अपने लैपटॉप और मोबाइल में व्यस्त हो जाते हैं ।इस व्यस्तता के चलते बालक अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। मानसिक रोगों से ग्रस्त हो रहे हैं। उनमें गुस्सैल प्रवृत्ति पनप रही है। वह बात -बात पर गुस्सा करते हैं ।चिड़चिड़ा हो रहे हैं ।इस सब के लिए दोषी माता-पिता है ।बालक में अच्छे संस्कार, अच्छे मूल्यों, का विकास मात्र पुस्तकों द्वारा नहीं हो सकता। उसके लिए हमें उसे प्रेरक प्रसंग ,नैतिक शिक्षाप्रद कहानियां, अपने जीवन के जुड़े अद्भुत अनुभव सुनाने चाहिए। ताकि हमारा बच्चा महान पुरुषों और महान व्यक्तित्व का अनुकरण करे।
बच्चे में अनुकरण करने की क्षमता बहुत अधिक होती है।। यदि हम उसके समक्ष टीवी देखेंगे देर रात तक, तो वह भी देखेगा । हमें उससे उससे उस समय मना करने का कोई अधिकार नहीं है। पहले हमें स्वयं को संयमित करना होगा ।तब हम अपने बच्चों को जो कि देश का भविष्य है सही मार्गदर्शन कर सकते हैं। ये बालक ही जीवन रूपी वृक्ष के फूल हैं। उन्हें खिलने से पहले ही मुरझाने का हम अज्ञानतावश कारण दे रहे हैं ।बच्चा अंदर से मुरझा चुका है ..तो उस पुष्प में सुगंध कैसे विकसित होगी? हम अपने बालक को अंदर से खोखला कर रहे हैं ।एक्टिविटी क्लासेस, ट्यूशन, ऑनलाइन क्लासेस ,इन सभी दिनचर्या में व्यस्त रखते हैं ।अपने बच्चे को मात्र मशीनों के साथ जीवन यापन करने के लिए बाधित करते हैं। हमें बच्चे को उसकी रुचि के कार्य भी करने देने चाहिए। ताकि हमारी बालक का सर्वांगीण विकास हो सके। वह जो विषय चुनना चाहता है, वही विषय उसे चुनने देना चाहिए ।बालक का मार्गदर्शन करना सही बात है, किंतु अपनी इच्छाओं को उस पर लाद देना गलत है ।
अब चार पंक्तियाँ इस मासूम बचपन के लिए---
बच्चों में से खो गई हैं,
बाल मन की सब निशानियां,
दूर हो गई हैं उनसे ,
दादी ,नानी की कहानियां।
अब कहां बच्चे कागज की नाव बनाते हैं ,
दूर हो गई हैं वह मासूम नादानियाँ।
बच्चों में से खो गई है बाल मन की निशानियां ...
प्रीति चौधरी "मनोरमा "
जनपद बुलंदशहर
उत्तर प्रदेश
मौलिक एवं अप्रकाशित
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