आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति-किरण

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आज मानसिक तनाव के चलते ,जीवन की   परेशानियों के कारण न जाने कितने लोग आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर विवश हो जाते हैं | किंतु क्या  मात्र आत्महत्या ही एक विकल्प है, अन्य कोई नहीं ? क्या जीवनलीला समाप्त होने के बाद इन सब से छुटकारा मिल सकता है ? कदापि नहीं | आत्मघात के बारे में कहना और सोचना भले ही सहज लगता हो परंतु इससे होगा क्या? भगौडो की तरह एक जन्म फिर दूसरे असंख्य जन्म... कब तक इंसान भाग सकता है ? यदि जीवन के इस सूत्र को मानव समझ ले तो काफी हद तक इस विचार से दूर रह सकता है|
अब प्रश्न ये उठता है कि ऐसे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से मानव आत्मघात करने पर मजबूर हो जाता है? अवसाद, निराशा,आर्थिक तंगी, रिश्तों में खटास,  मादक दवाइयों का सेवन, किसी के प्रति अत्यधिक अपेक्षा का भाव, शैक्षणिक तनाव, बेरोजगारी, पारिवारिक विघटन, तेजी से बदलती जीवन शैली,रहन- सहन में बदलाव, भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति, कम समय में अधिक पाने की चाहत, इलैक्ट्रॉनिक्स मीडिया का प्रभाव आदि ऐसे बहुत से कारण हैं जो व्यक्ति को इस तरह के कदम उठाने पर मजबूर करते हैं | यदि आँकड़ों की माने तो आबादी का एक चौथाई से अधिक हिस्सा आज का युवा वर्ग है जो आत्महत्या करने को मजबूर होता है | आज न सिर्फ युवा वर्ग ही तनाव में जीता है अपितु प्रत्येक उम्र के लोग अवसाद के शिकार हैं | विभिन्न आयु वर्ग के लोगों में तनाव की परिस्थिति भिन्न होती है | आज के इस दौर में बाल्यावस्था में ही बच्चे इससे पीड़ित दिखाई देते हैं | बच्चे द्वारा बताई गई परेशानी को परिजनो द्वारा अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है | परिणामस्वरूप वह अपनी कोई भी बात उनसे खुलकर नहीं कर पाता | किसी बात को अपने भीतर ही सीमित रखना, निरंतर उसी बात को मन मस्तिष्क में दोहराते रहना, जीवन के प्रति निराशा व असंतोष का भाव, नकारात्मक विचारों का प्रसार व्यक्ति को जीवन लीला समाप्त करने पर मजबूर कर देता है |  दिशाहीन लक्ष्यहीन युवा वर्ग में सहनशीलता की कमी की वजह से वो स्वयं को कमतर आँकने लगते हैं और जीवन के अन्त में  ही  समस्याओं का अंत समझने की भूल कर बैठते हैं | पहले तो यह स्थिति अधिकतर निम्न या मध्यम वर्ग में देखने को मिलती थी,किंतु उच्च वर्ग में मानसिक तनाव का बढ़ता असर भी आज चिंतनीय विषय है |  काम की अधिकता, विश्राम का अभाव ,कलहपूर्ण माहौल में व्यक्ति शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वयं को अस्वस्थ महसूस करने लगता है | आज सभी अपनी अपनी दिनचर्या में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि एक घर में रहते हुए भी आपसी वार्तालाप का अभाव होता है | डिब्बाबन्द घरों में बंद जीवन के साथ-साथ मानवीय भावनाएँ भी संकुचित होती जा रही हैं | 
हमें इन सबसे उबरने के लिए अन्य विकल्प तलाशने होंगे | यदि हमें मारना है तो हम अपने नकारात्मक विचारों को मारें,अपदुर्बलताओं को खोज कर उसे दूर करने का प्रयत्न करें | लालसा की वृति और दुख से भागने की प्रवृति का त्याग करे | उम्मीद की एक किरण भी समस्त अंधेरे को मिटाने का सामर्थ्य रखती है | परेशानी को अपने भीतर घर ना करने दें,हो सके तो उसे अपने करीबी से साझा करे | यह जीवन बेशकीमती है,हमारे लिये भी और हमारे परिजनो के लिए भी | इस बात को सदैव ध्यान में रखें और सकारात्मक सोच को अपनाएं |
                     ---©किरण बाला, चण्डीगढ़