अन्तर्द्वन्द-कहानी एक रचनाकार दस, पढ़ कर देखे।




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(लम्बी कहानी)


रोज की तरह आज भी बैंक में बहुत शोर-शराबा था लेकिन कैशियर नंदिनी के कानों में एक सन्नाटा सा पसरा था और मन में विचारों का ज्वार-भाटा। काउंटर में आँखें गड़ाए किसी मशीन की तरह नोट गिनकर ग्राहकों को थमाए जा रही थी। हाथ भी ऐसा सधा हुआ था उसका कि क्या मजाल किसी गलती की , जो अनजाने में हो जाए! चिंता का कारण आज भी वही, उसके पति सुजीत का रवैया। पिछले महीने से ही न जाने किस दुनिया में रहने लगा है! न ढंग से खाना न पीना! न छेड़छाड़ करती वे प्यारी-प्यारी बातें , न ही वह व्यवहार जिसने शादी के एक साल होते-होते ही उसे उससे ऐसे बाँध दिया था जैसे कितने जन्मों के साथी हों। बार-बार सोचती कि कहीं मुझसे ही तो कोई गलती नहीं हो रही जिससे सुजीत का दिल दुख रहा हो? लेकिन कुछ समझ नही आता। अगर कोई भूल हो रही है तो सीधे बता भी तो सकता है! अब क्या पराई रह गयी हूँ उसके लिए! कितनी बार पूछ लिया मगर हर बार टालमटोल। ओह्ह्ह!“मैनेजर सर बुला रहे हैं तुमको, वो जिस ग्राहक का चेक कैश नहीं हो पाया था पिछले हफ्ते, वह आया हुआ है “सहकर्मी नेहा की आवाज ने नंदिनी को ख्यालों के भँवर से बाहर खींचा।
“अरे लेकिन यहाँ इतने लोग जमा अभी...” नंदिनी की बात अधूरी रह गयी।
“तुम जाओ न, मैं देख लूँगी यहाँ का...जानती नहीं सर की हड़बड़ी वाली आदत?” नेहा ने उसको हाथ पकड़ के कुर्सी से उठाते हुए कहा। नंदिनी जाने लगी तो नेहा ने फिर टोका।
“ये फाइल तो लेती जाओ! सब रिकॉर्ड इसी में...!”
“ओह हाँ”
नंदिनी को ध्यान आया और उसने जल्दी से वह फाइल उठा ली और निकल गयी। मैनेजर के केबिन में पहुँचते ही साहब शुरू हो गये।“अरे नंदिनी, तुमको बोला था न कि पहले दस्तखत जाँच लेना। नंदिनी को पिछले सप्ताह अपने काम में की महत्वपूर्ण चूक याद आई ।वह अपने पेशेवर जिन्दगी में अपने तन्मयता पूर्ण काम के लिए मशहूर थी ।यह बात मैनेजर से भी छुपी नहीं थी ।पर निजी जिन्दगी में नंदिनी को अपनी पहचान खोती सी लग रही थी ।नंदिनी ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया  " जी अच्छा "यूँ तो अपने कठोर और रूखे व्यवहार के लिए मशहूर मैनेजर सामान्यतः किसी भी मातहत के निजी जीवन में कोई रूचि नहीं रखते थे ।परन्तु नंदिनी के साथ बात कुछ और थी ।वे उसे एक मेधावी अपने काम से काम रखने वाली महत्वाकांक्षी सहकर्मी  के रूप में जानते थे । उसे काम के प्रति सतर्कता बरतने की हिदायत देना भी थोड़ा बहुत इस पहचान के कारण भी था ।वे समझ नहीं पा रहे थे हमेशा मुसतैदी से अपना काम करने वाली नंदिनी गलती भी कर सकती है ।उन्होंने उसे बैठने का इशारा किया और एक जरूरी फोन कॉल में व्यस्त हो गए ।नंदिनी के लिए कुछ देर भी रूकना मुश्किल हो रहा था ।फिर भी उसने धन्यवाद कह बैठ जाना ही उचित समझा ।फोन पर बात खत्म होते ही मैनेजर उससे मुखातिब हो पूछ बैठे "क्या बात है कोई बड़ी परेशानी है क्या? ऑफिस से जुड़ी परेशानी हो तो मैं तुरंत कोई समाधान ढूंढने की कोशिश करूँगा, एक विराम के बाद, बात जारी रखते हुए बोले,"एक बात अवश्य कहूँगा बैंक की नौकरी है एक छोटी सी चूक भी बहुत मायने रखती है । सतर्कता और तन्मयता किसी भी काम की पहली शर्त हैं ।"'जी आगे से ध्यान रखूंगी ' यह कह कर वह केबिन से बाहर निकल गई ।

मैनेजर के केबिन से बाहर निकालते ही नंदिनी की आँखे भर आई, उसने अपनी आखों से उमड़ते सैलाब को बहुत रोकने की कोशिश की लेकिन आँसू रोकने से कब रुकते हैं, अपनी नम आँखे पोंछते हुए वह पुनः अपनी सीट पर आ कर बैठ गई l उसका दिमाग एकदम सुन्न पड़ गया था, आज अपनी निजी जिंदगी के कारण उसे अपने मैनेजर के आगे शर्मिंदा होना पड़ा l सामने पड़ी पानी की बोतल से दो घूंट पानी पी कर उसने एक लंबी साँस ली, लेकिन उसके दिमाग में तो बस सुजीत ही छाया हुआ था सुजीत कहने को तो उसका पति है लेकिन न जाने क्यों वह  अब उससे उखड़ा-उखड़ा रहने लगा है lएक दूजे के बिना एक पल भी अलग नहीं रह सकते थे, न जाने किसकी नजर लग गई और अब सुजीत उसके साथ सीधे मुहँ बात भी नहीं करता l अपने विचारो. में खोई नंदिनी को पता ही नहीं चला कब नेहा उसके सामने आ कर बैठ गई थी lउसने पाया कि नेहा उसे घूर कर देख रही है,"क्या बात है नंदिनी तुम मुझे अपनी परेशानी नहीं बताओंगी, कहते हैं" दुख बांटने से कम होता है"  शायद मैं तुम्हारी समस्या का समाधान कर सकूँ|"नेहा की प्यार भरी बातें सुन कर नंदिनी पिघल गई और आँखों से लगातार अश्रुधारा बहने लगी, जिसे देख नेहा भी हिल गई जल्दी से वह अपनी कुर्सी से उठी और नंदिनी के आंसू अपने रुमाल से पोंछ गले से लगा लिया lपास के ही कैफे से दो काफी बना कर ले आई औए एक कप नंदिता के आगे सरका दिया, आँखों ही आँखों से उसने नंदिता से सवाल किया और नंदिता ने उसके सामने अपने दिल का सारा हाल ब्यान कर दिया lकुछ देर चुप्पी के बाद नेहा बोली,"नंदिनी इस समस्या का हल तो खोजना पड़ेगा, मैं तुम्हारे साथ हूँ, लेकिन एक वादा करो, न तो तुम आँसू  बहाओगी और न ही सुजीत के सामने तुम कमजोर पड़ोगी l मैं आज शाम को तुम्हारे घर आ रहीं हूँ,  तुम, मैं और सुजीत मिल कर डिनर करेंगे और इस विषय में भी बातें करेंगे।" ठीक है नेहा।" कहती हुई नंदिनी फिर अपने काम में जुट गई और एक-एक करके ध्यान से सारा काम निपटाने लगी ।शाम होते- होते नेहा की आवाज से वह चौक उठी।"क्या आज बैंक में ही रहने का इरादा है  ?"उसने अपनी कलाई घड़ी पर नजरे फेरी तो शाम के साढ़े पाँच बज रहे थे।"अरे नहीं यार,"कहते हुए उसने जल्दी से सब क्लोज किया और बैग उठाते हुए नेहा के साथ निकल पड़ी। नेहा नंदिनी की सहयोगी ही नहीं बहुत अच्छी सहेली भी है। दो वर्ष पहले जब वह इस बैंक में पोस्टिंग होकर  वह आई थी,तब नेहा के खुश मिजाज और मिलनसार व्यक्तित्व ने उसे बहुत आकर्षित किया था।फिर जल्दी ही दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई थी। बैंक से बाहर निकल कर दोनों ने अपनी-अपनी स्कूटी निकाली।नेहा ने कहा "चल फिर मिलते हैं डिनर टेबल पर। लेकिन याद रखना तुम कभी कमजोर नहीं पड़ोगी। यार हम इस प्रोब्लम का हल जरुर ढूंढ निकालेंगे।"कहती हुई नेहा निकल गई। "कितनी बिंदास लड़की है! हर वक्त लोगों की मदद करने को आतुर रहती है।"


नंदिनी मन ही मन सोचती हुई घर की ओर बढ़ने लगी। तभी उसे याद आया , घर में सब्जी वगैरह नहीं है। नेहा डिनर पर आने के लिए कह गई है। उसने स्कूटी को मंडी की ओर मोड़ दिया । बैंगन सुजीत को बहुत पसंद है, आज मै भरवां बैंगन बनाऊंगी, " उसने मन ही मन सोचा।नेहा की  पसंद को देखते कुछ और सब्जी भी नंदिनी ने खरीद ली थी, साथ ही लवली स्वीट्स से एक पैकेट पनीर और गुलाब जामुन भी । नंदिनी ने फटाफट सारा सामान बैग के अंदर रखा और जैसे ही स्कूटी स्टार्ट करने लगी वैसे ही किसी की जानी- पहचानी आवाज उसके कानों में पड़ी।
"भाभी जी नमस्कार
मुड़कर नंदिनी ने देखा,जिस तरफ से आवाज आ रही थी........।
अरे ! ये तो अनूप है सुजीत का बेस्ट फ्रेंड!
अनूप के नमस्ते का जवाब देते हुए नंदिनी ने पूछा
"अरे , आप यहां !"
"हाँ, भाभी जी बाजार आये थे कुछ शॉपिंग करनी थी अनूप ने जवाब दिया ।"
"अच्छा, और सब कुछ कैसा चल रहा विनीता कैसी है ? बच्चे कैसे है ?" नंदिनी ने पूछा
"सब कुछ बढ़िया है भाभी जी और आप सन्डे को आ रही है न हमारे घर मेरी मैरिज एनिवर्सरी पार्टी मे ?, सुजीत से तो मैंने काफी पहले ही कह दिया था , सुजीत ने बताया नही आपको !"
मैं भी थोड़ी व्यस्त हूँ तो शायद मैंने ध्यान नही दिया सुजीत कुछ कह तो रहे थे, जल्दी से नंदिनी ने बात को सँभाला ।"
"ठीक है भाभी मैं चलता हूँ आप दोनों जरूर आइयेगा नमस्ते !"
अनूप के जाते ही नंदिनी को लगा यह क्या बात हुई ? क्या सच सुजीत बदल गया नंदिनी ने स्कूटी स्टार्ट की और सभी सामान के साथ घर की ओर चल दी । पर उसे पता नही क्यों अजीब सा लग रहा था ।घर पहुंचते ही नंदिनी ने जल्दी से  शॉवर लिया,  उसे अच्छा लगा जैसे सारी थकान और चिंताएं थोड़ी देर के लिए उसके मन-मस्तिष्क से हट गयी  .... तब तक बाई भी आ गयी उसे रात के खाने मे क्या बनेगा कुछ इंस्ट्रक्शन देते हुए खुद डाइनिंग टेबिल तथा कमरे को व्यवस्थित करने लगी वॉल पर लगी हनीमून की तस्वीर को ठीक करते अचानक उसे याद आया किस तरह वह विवाह के कुछ दिनों बाद दोनो एक साथ कुल्लू-मनाली की मनमोहक वादियो मे दोनो जैसे एक दूसरे मे खो गये कि वापसी का दिन कैसे आ गया उन्हें पता ही नही चला।आज भी उन दिनों को याद कर उसका सौन्दर्य और भी बढ़ जाता  यह प्यार मे डूबे हुए लम्हों का जादू था !"पर हाय ! यह क्या हो गया सुजीत ऐसे कैसे बदल गया" डोरबेल की घण्टी से उसकी तन्द्रा टूटी भाग कर वह दरवाजे पर गयी लगा सुजीत होंगे,लेकिन दरवाजे पर नेहा खड़ी थी ! बिल्कुल तरोताजा पिंक सूट पहने हुए"अरे, नेहा आ जाओ" नंदिनी ने उसे अंदर आने को कहा। "और क्या-क्या  खाने मे बना है !" चहकती हुई नेहा ने पूछा।चलो देख लो किचन मे कुछ बन गया, कुछ बना रहे" "अरे वाह !"
"क्या लोगी नेहा" । "कुछ नही बस आओ बैठो बाते करते है ""सुजीत को फोन किया तुमने ?"  नेहा ने पूछा "हाँ, पर फोन उठा नही ।"ओह, साढ़े आठ बज गये, अभी तक सुजीत आये क्यो नही ?"नंदिनी को थोड़ी बेचैनी होने लगी,  डिनर भी तैयार था नेहा को भी देर हो रही थी । तभी डोर बेल बजते ही नन्दिनी भाग कर दरवाजे पर गयी और दरवाजा खोलते ही उसे एक अजीब महक सी आयी अजनबी के साथ सुजीत को देखा जो जो सुजीत को अपने कंधे का सहारा दिये हुए था ।“सुजीत ! ये क्या हाल बना रखा है,और तुम शराब पीकर आये हो ?”तभी वह अजनबी बोला-“ये लड़खड़ाते हुए नाले के किनारे-किनारे चल रहे थे ।भले से लगे तो मैं अपने रिक्शा में यहाँ ले आया ।”नंदिनी की प्रश्नसूचक नज़रें स्वयं पर गढ़ी देखकर बोला -“इनके पर्स में आधार कार्ड मिल गया था,बाक़ी मैंने कुछ नहीं देखा न लिया ।आप विश्वास करिये मेरा ! पर पहले आप इन्हें सम्भालिये ।”तब तक नेहा भी वहाँ आ चुकी थी दोनों ने मिलकर सुजीत को बेडरूम तक पहुँचाया।नंदिनी वापस दरवाज़े तक आयी तब तक वह अजनबी जा चुका था ।ज्यों ही मुड़ी, नेहा सामने खड़ी थी।“चल नंदिनी मैं चलती हूँ तू अभी सुजीत को सम्हाल।और देख पेशेंस रखना।कहते हैं ... नशे में आदमी मन की वो बात कह देता है जो वह होश में नहीं कह पाता।क्या पता सुजीत अपने मन की गाँठ खोल दे ।”
नंदिनी के दर्द को सहला नेहा भी बिना डिनर किये घर के लिये निकल गयी। दरवाजा बंद कर तमतमाई नंदिनी सुजीत के पास आयी, सुजीत बेसुध पड़े थे, बेबसी, गुस्सा, क्षोभ सबका मिला जुला असर था हृदयावेग आँखों के रास्ते बह चला | आधार कार्ड सुजीत की ड्रॉअर में रखने को ड्राअर खोली तो अस्त-व्यस्त सी ड्राअर में सबसे नीचे लगभग बिछी हुई-सी एक फ़ाइल दिखी। उत्सुकतावश निकालकर पढ़ने लगी ।पढ़कर सकते में आ गयी।चेहरा पीला पड़ गया। निढाल -सी पथराई आँखों से रिपोर्ट को देखे जा रही थी जिसमें उसके जीवन का सबसे बड़ा राज छुपा था। एकाएक चेहरा तमतमा गया । “स्त्री विषाद के नमकीन पानी को आँखों के तटबंध तोड़ बहते रहे अपने दग्ध हृदय ,तप्त मन को पीड़ा खुद से सहलाती रही।”
      सुबह अलार्म की आवाज से तन्द्रता टूटी ,लेकिन उठने का मन ही नहीं किया नंदिनी का ।सोता हुआ सुजीत उसे किसी मासूम बच्चे- सा लग रहा था। अब उसे उस पर गुस्सा नहीं तरस आ रहा था ।पिछले एक महीने में ही क्या हालत बना ली है इसने अपनी ।“इतना अविश्वास ! इतनी बड़ी बात छुपायी मुझसे।” इतना गुस्सा मत कर नंदिनी !सोच यह रिपोर्ट जानकर उसके दिल पर भी क्या बीती होगी ।उसका भी तो पौरुष चोटिल हुआ होगा । एक बात जान ले “पुरुष का अहम कभी भी स्त्री के समक्ष स्वयं को कमजोर नहीं मानने देता।” स्वयं को दिलासा देने लगी नंदिनी।
“यह क्या बात हुई  पति -पत्नी का संबंध विश्वास और प्यार से चलता है ,दुराव- छिपाव के लिये कोई स्थान नहीं होता वहाँ । तुमसे ज्यादा किसी चीज की अहमियत नहीं है मेरी जिंदगी में सुजीत। काश !एक बार बताया तो होता ।”अपने ही अंतर्द्वंद्व से जूझती नंदिनी तय नहीं कर पा रही थी कि इस विषय में सुजीत से बात करे या प्रतीक्षा।
कल तक जो प्यार की बरसात करता था मुझ पर, अचानक मैं उसे दोषी मान बैठी ! नहीं ….नहीं मुझे स्वयं को एवं सुजीत को भी सँभालना होगा ।सोचते -सोचते कदम रसोईघर की तरफ बढ़ गये। यंत्रचालित-सी दो कप चाय चढ़ा मन के द्वन्द में उलझी नंदिनी,  कैसे बात करूँ?  कैसे पहल करूँ?  बस यही सोचती जा रही थी ।चाय उबल कर पूरे चूल्हे पर फैल गई, ओह ! सिर भारी हो रहा है,घड़ी पर नजर गयी तो जल्दी से गैस ऑफ कर तैयार होने चल दी । देर हो रही थी सोचा बाई आयेगी तो उसे ही चाय बनाने बोल दूँगी।तब तक सुजीत भी उठ जायेंगे ।तेजी से बाथरूम की ओर बढ़ गई  नंदिनी । शावर खोल कर कुछ देर यूँ ही अपने आपको भिगोते रहना नंदिनी को बहुत प्रिय था ,  लेकिन आज झट पट नहा धोकर बाहर निकल आई ।आईने के सामने खड़ी हुई तो सोते  हुए शीशे में सुजीत के चेहरे पर नज़र पड़ी ।अचानक उसे चुहल सूझी। अपने गीले बालों को बिना लपेटे  सुजीत के चेहरे पर झुक गई ।बालों से टपकते हुए चंद बूँदे सुजीत के चेहरे पर गिरीं , प्यार की मीठी फुहार से भला कोई कैसे अछूता रह सकता है ! सुजीत शायद जग गये थे ,उन्होंने पल भर बिना देर किये उसे अपनी बाहों में समेट लिया।बिना कोई प्रतिकार किये नंदिनी सब कुछ भूल कर सुजीत की बाहों में सिमटती चली गयी ।तप्त एवं व्यथित  हृदय पर प्यार की पहली बरसात अहा ! वक्त मानों  थम-सा गया , एक दूसरे की धड़कन एकाकार होने लगी ।
तभी कॉल बेल की आवाज सुनकर नंदनी गेट की ओर लपकी ।गेट खोलते हुए सामने दीवार घड़ी पर नज़र पड़ी । बाई को सबसे पहले चाय बनाने का बोल कमरे की ओर बढ़ गयी ।हमेशा की तरह सुजीत के कपड़े, मौजे, रूमाल सब निकाल कर एक ओर रखने लगी । रूमाल में कई दिनों बाद सुजीत के पसंद का सेंट हल्का सा स्प्रे करते ही भीनी खुशबू से पूरा कमरा महक उठा ।सुजीत भी फ्रेश होकर  बाथरूम से निकल नंदिनी के कंधे पर हाथ रखते हुए  बोले,"सॉरी नंदिनी  कल दोस्तों के साथ कुछ ज्यादा हो गया ,थैंक्यू ; वन्स अगेन नंदिनी, तुमने मुझे सँभाल लिया । तुम्हारी जगह कोई और होती तो अभी तक घर से बाहर का रास्ता मुझे शायद दिखा देती ।""इट्स ओके...दोस्तों के साथ कभी-कभी ऐसा हो जाता है । आप तैयार होकर आइये मैं नाश्ता लगाती हूँ ।"कल के चिंता के घने बादल तो छँट गये थे लेकिन आज नये बादल घनेरे  हो वर्तमान को घेरे हुए थे  । बस स्वरुप बदल चुका था । अब भय एवं उदासीनता को भूल सजग रहने की जरूरत थी । दोनों चुपचाप नाश्ता करने लगे । ऐसा लग रहा था मानों कल कुछ हुआ ही नहीं ।मनमंथन में मशगूल दोनों थे चुपचाप नाश्ता कर, तैयार होने कमरे में चल दिये ।
माथे पर बिंदी सजाते हुए नंदिनी के हाथ काँप उठे । आंखें भी छलक आई ,फिर भी उसने धीरज से काम लेते हुए अपने मनोभावों को नियंत्रित किया ।  इतनी जल्दी घबराने से काम नहीं चलेगा । हर समस्या का समाधान ईश्वर जरूर तय करते हैं, हमें समास्या का पता चल गया है ,समाधान भी जरूर तलाश लूँगी ।प्यार एवं स्पर्श की कशिश  नंदनी के दिलोदिमाग में मची  हलचल को कुछ हद तक शांत कर चुकी थी ।जहाँ इतने दिन बीते दो दिन और रूक जाती हूँ । रविवार को सुजीत से आराम से बात करती हूँ ।पत्नी हूँँ अर्धांगिनी कहलाती हूँ ,कैसे अपने प्यार को बुरा भला कह सकती हूँ ?नहीं....मुझे संयम रखना होगा ।
आज कई दिनों बाद डर के साये में भी उसका खोया आत्मविश्वास लौट आया था । कल तक संशय के बादल छाये थे ,अब सब कुछ स्पष्ट हो चुका था,वह कहावत है ना--"धीरज धरम् मित्र और नारी, आपत काल परखिये चारी"...
क्षुब्ध था मन उसका, लेकिन विचारों का आवागमन थम नहीं रहा था, क्या-क्या सपने देखे थे दोनों ने। सुजीत को तो ज़बरदस्त चाह थी बच्चे की। प्रायः नंदिनी को छेड़ता रहता था वो ,बच्चे के लिए | शायद इसीलिए वो टूट गया था, जब कोई बड़ा सपना टूटता दिखता है तो हताशा घेर लेती है | नंदिनी ने निश्चय कर लिया था सुजीत को सम्भालने का अब और नहीं  वो पति के जीवंत व्यवहार, घर की हँसी-ख़ुशी लौटायेगी |
सुजीत की रिपोर्ट लेकर नंदिनी शहर के एक्स्पर्ट डॉक्टर के यहाँ पहुँची,नंदिनी ने ऑफिस कॉल कर पहले ही छुट्टी ले ली थी  l
नंदिनी ने सुजीत की मेडिकल रिपोर्ट डॉक्टर को देते हुए अपनी वस्तुस्थिति से अवगत कराया , उन्होंने नंदिनी की समस्या पर विचार किया संयोग से डॉक्टर की पत्नी ( जो स्वयं एक मानी हुई मनोचिकित्सक थी ) ने सारी समस्या सुनी और नंदिनी को थोड़ा धैर्य और समझदारी से काम लेते हुए कुछ उपाय सुझाये,
नंदिनी के स्नेहिल और अपनत्व भरे व्यवहार से सुजीत के मन पर जमी हिम थोड़ा पिंघलने लगी थी | थोड़ी शर्मीली नंदिनी के बदले हुए पत्नी रूप को देख कर वो अचंभित था | तीन चार दिन ऐसे ही बीते और एक दिन सुजीत ने अपने किसी दोस्त के ऊपर ढालते हुए नंदिनी के सामने समस्या रखी |मौका देख एक दिन सुजीत ने कहा, "जानती हो नंदिनी  मेरा एक दोस्त है उसे बच्चों से बहुत प्यार है ।लेकिन !एक गहरी ख़ामोशी के बाद कहा था सुजीत ने जैसे शब्दों के भावावेश में अंदर का गुब्बारा रोका हो"लेकिन वो बाप नहीं बन सकता है।  क्या करे बिचारा?  तकदीर भी क्या धोखेबाज निकली।"वह बड़ी मायूसी से बोल रहा था।सुजीत की टूटन, मायूसी नंदिनी को भी तोड़ रही थी लेकिन खुद को संयमित करते हुए बोली"अरे ऐसा है!"नंदिनी  समझ रही थी उसकी बेचैनी । देख पा रही थी उसकी आँखों में सूनापन ।वह एक समझदार जीवनसाथी की तरह बड़े प्यार से समझाने लगी ।"कोई बात नहीं सुजीत उसे ईश्वर ने अपने से बाहर देखने का मौका दिया है।किसी की ज़िन्दगी सुधारने का अवसर।उसे खुश होना चाहिए।"उत्त्साहित होते हुए नंदिनी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा,
"खुद का न सही उसे अनाथाश्रम से बच्चा अडाप्ट कर लेना चाहिए। उसकी जिन्दगी में बहार आ जायेगी। दो जीवन में खुशियाँ आ जाएगी एक परिवार पूर्ण हो जायेगा |"हैं ! क्या कहा तुमने ?"


सुजीत के चेहरे पर कई भाव एक साथ दिखने लगे। "हाँ, ठीक सुना है,तुमने।" "पर तुम तो ।" सुजीत ने बात अधूरी छोड़ दी। नंदिनी को याद थी वह घटना। एक बार कुछ दोस्तों के बीच चल रही गपशप में अनाथ बच्चों को एडॉप्ट करने की बात उठी, तो नंदिनी ने इस का पुरजोर विरोध किया था। उसका कहना था कि चाहे उन्हें वहीं रहते हुए मदद कर दी जाये, पर एडॉप्ट करना ठीक नहीं। क्योंकि पता नही किन माता-पिता की संतानें होगे वो। उसका मानना था कि पैदाइश किससे हुई, व्यक्तित्व पर इसका बहुत ज्यादा असर होता है। अगर बीज और ज़मीन ही खराब होगी तो उत्तम पैदावार कैसे होगी ? अच्छी परवरिश से भी व्यक्तित्व बनाया जा सकता है, इस बात को उसने पूरी तरह नकार दिया था।आज इतनी आसानी से अनाथ बच्चे को एडॉप्ट करने की सलाह नंदिनी से सुनकर सुजीत का अचरज में पड़ना स्वाभाविक था।


नंदिनी ने संजीदगी से कहा - ''मन पर पड़े मान्यताओं के पर्दे सुखद विचारों की मंद पवन से भले न हटें, तेज़ हवा के झौंके की तरह घटित घटनाएँ उन्हें हटा सकती है।“सुजीत ने नंदिनी की तरफ प्रश्नसूचक दृष्टि से देखा-"तुम सुदीप्ता सरकार को जानते हो न, वही जिनके स्कूल की कई शाखाएँ अपने शहर में ही नही अब दूसरे शहरों में भी खुल गयी हैं।""हाँ, इस शहर में रहते हुए भला उन्हें कौन न पहचानेगा ?" "उनका खाता हमारे बैंक में है, पिछले कई दिनों से उनके अकाउंट से छोटे-छोटे अमाउंट के कई चेक लगातार पेमेंट के लिये आ रहे थे। कुछ दिनों पहले उनका पाँच करोड़ पाँच लाख का चेक कैश होने आया। पहले ही लगातार आ रहे चेक्स को देखकर मुझे कुछ खटक रहा था। मेरे मैनेजर ने तो कह दिया कि सिग्नेचर मिलाकर पेमेंट कर दो,पर मैंने सुदीप्ता जी से बात करना चाहा। वैसे बैंक में नियम भी है कि बड़े अमाउंट के चेक पेमेंट के लिये आने पर कस्टमर्स से कन्फर्म करना होता है कि चेक उसने ही जारी किया है।पर अकाउंट में डले नंबर पर उनके भतीजे सुशांत ने कॉल उठायी और चेक पेमेंट कर देने को कहा। पर मेरा मन नही माना और फिर मैंने सुदीप्ता जी की बेटी अबोली को फोन किया। उससे मेरा थोड़ा-सा परिचय था,क्योंकि वही पहले एकाउंट्स को देखा करती थ। उसने सुदीप्ता जी से बात की और तुरंत उनका फोन मेरे पास आया और उन्होंने चेक रोकने को कहा। फिर उन्होंने बैंक आकर वो चेक ही नहीं और भी तमाम कितने ही चेक्स के पेमेंट फर्जी बताये। पहली ही नज़र में यह समझ आ गया था कि यह सारे चेक्स सुशांत ने जारी किये थे। सुदीप्ता जी के विश्वास का फायदा उठाकर सुशांत ने उनसे दस्तखत करवा लिये थे। उन्होंने शिकायत दर्ज की,पर अब उनका खाता सील कर दिया गया है और अब जब तक यह केस चलेगा तब तक उनका अकाउंट सील ही रहेगा।
आगे स्कूल को चलाने के लिये फण्ड किसने दिया ? जानना चाहोगे ? उनकी बेटी अबोली ने। ""पर तुम यह सब अभी क्यों बता रही हो ?""सुदीप्ता जी के साथ काफ़ी वक्त गुजरा मेरा और तब एक बेहद महत्वपूर्ण बात मुझे पता चली। सुशांत सुदीप्ता जी का ही बेटा है। उनका एक बड़ा पुत्र था। जब दूसरा पुत्र पैदा हुआ तो परिवार और मि० सरकार के दबाव में आकर अपना नवजात पुत्र उन्हें मि० सरकार के निःसंतान बड़े भाई-भाभी को गोद देना पड़ा। पर दुर्योग से कुछ वर्षों के बाद उनका बड़ा बेटा नहीं रहा।पर विधिवत गोद दिए अपने पुत्र को वह वापस नहीं ले सकती थीं। कुछ कारणों से अब वह फिर से माँ भी नहीं बन सकती थीं। तभी उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया। कचरे के ढेर में फेंकी गयी एक नवजात कन्या को अपनी बेटी बनाकर अपना लिया, वही अबोली है।"
"ओहो, फिर ....? ""सुशांत जिस परिवार में पला,उनका बिजीनेस काफी फल-फूल रहा था,अत्यधिक प्यार  और गलत परवरिश के चलते सुशांत की आदतें बिगड़ चुकी हैं। बिजीनेस वो ठीक से चला नहीं पाया, तो वो भी घाटे में चल रहा है। पुत्र मोह में मि० सरकार और सुदीप्ता जी ने स्कूल का मैनेजमेंट और एकाउंट्स अबोली से लेकर सुशांत को दे दिये थे।
सुदीप्ता जी की परवरिश में अबोली ने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। अभी वह बहुत अच्छा जॉब करने लगी है। उसका सौम्य और सलीकेदार व्यक्तित्व एकदम सुदीप्ता जी की तरह है  और  संस्कार भी। आज उसी के कारण सुदीप्ता जी इतनी मुश्किल में भी कुछ राहत महसूस कर रही हैं।यही देखकर मेरी धारणा बदल गयी। सुशांत तो सुदीप्ता जी का ही खून है,पर परवरिश का अन्तर होने से उसकी सोच में कितना बड़ा फर्क आया।""यानि अब तुम्हें परवरिश का महत्व पता चल गया है। है ना ?'- सुजीत ने कहा।"हाँ, सुशांत कुछ गड़बड़ कर रहा है,यह मि० सरकार को पता चल गया था। पर अपने बेटे की परवरिश गलत हाथों में देने की गलती उन्हीं की थी तो यह बात उन्होंने सुदीप्ता जी से छुपायी।  तब एक बात और जानी मैंने।""क्या '? सुजीत ने पूछा। "यही कि अपने जीवन साथी से कोई भी बात छुपाना ठीक नहीं होता ।"  -नंदिनी ने सुजीत की आँखों में झाँकते हुए कहा और उससे छुपायी गयी बात सुनने की प्रतीक्षा करने लगी।अपनी आँखों में झाँकती नंदिनी की आँखे सुजीत को बेहद सुकून और आश्वासन देती दिखीं। उसने नंदिनी को बाहों से घेरा और कहा "सच कहा तुमने। मैं मि० सरकार की तरह नही होना चाहता। आज मैं भी कुछ सच तुम्हारे सामने रखना चाहता हूँ।"


समाप्त


अपना अंगना साहित्यिक समूह द्वारा एक प्रयोगग किया गया है। एक कहानी को दस लोगो ने लिखा है। पढने पर पता नही चलता।  रचनाकार-कुमार गौरव अजीतेन्दु , यमुना पाठक, रेखा जोशी, रीता सिंह "सर्जना ", रचना वर्मा, वर्सा अग्रवाल, आरती रॉय  , निशा मित्तल,  कल्पना दुबे ,महिमा श्रीवास्तव।