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घिरी आइल कारी बदरिया हो सखि गाव$कजरिया ।२
घिरल बदरवा, त$चमकल बिजूरिया ।
भइल गगनवा करिया ही करिया।।
सूझे ना तनिको डगरिया हो सखि गाव$कजरिया ।२
घिरी ।।
लौका जब लुउकेला मन घबड़ाला।
घटवा जब गरजेला बहुते डेराला।।
बरसेला रिमझिम बदरिया हो सखि गाव सखि गाव$कजरिया२।
घिरी आइल ।।
बहे पुरविइया पवन झकझोरे,
अंग-अंग में हमरो रस पोरे-पोरे ।
भींजेला हमरो चुनरिया हो सखि गाव$कजरिया ,
घिरी।।२
पेन्ही -ओढ़ी अँखिया में डाल$तू कजरा ,
केशवा सँवार के लगाल$तछ गजरा ।
आइल पिरीतिया के घड़िया हो ,सखि गाव$कजरिया ,
घिरी।।२
ना अइले कान्हा ना भेजले सनेशवा
प्रतिभा के तनिको ना लागेला मनवा ।
नजरिया से देखतीं साँवरिया हो सखि गाव$कजरिया ।
घिरी आइल.।।
उनहीं का आसरा में बीतल रैना
निंदियो ना आइल हमार दुनु नैना।
ना लागल झूला डरिया हो सखि गाव$ कजरिया।
घिरी आइल ।।
डॉ. प्रतिभा कुमारी पराशर
हाजीपुर बिहार
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