चाँद-किरण

कविता
पूछा है कभी चाँद से किसी ने
चन्दा तुम कैसे हो? 
सुनते हो बस सदा हमारी
अपनी भी कुछ कह तो लो 
विशाल ह्रदय कहाँ से पाया 
जिसमें है सब भेद छिपाया
सुख-दुख के तमाम किस्से
हर कोई तुम्हें सुनाने आया
आज तो चन्दा तुम मुख खोलो
चुप ना रहो, कुछ तो बोलो
कौन तुम्हारा संगी साथी 
किस संग तुमने प्रीत लगाई ?
या फिर इसलिए छिपते हो
भाती है तुमको भी तन्हाई
शायद छिपकर ही रो लेते हो
मन को हलका कर लेते हो 
फिर आ जाते हो तुम लेकर
नित सदा एक मुस्कान नई 
भेद तुम्हारा अब तो चन्दा
सब कुछ  ही मैं जान गई


किरण बाला, चंडीगढ