मेरे पापा की बात निराली है

लखनऊ से ज्‍योति किरण रतन जी की प्रस्‍तुति


लखनऊ से आरव मेरे पापा मेरे हीरो हैं उनका हर काम हर बात मुझे अच्छी लगती है।वो बहुत एनर्जेटिक पर्सन हैं। जब कोई ये बोलता है कि मैं अपने पापा जैसा दिखता हूँ और उनकी तरह की हरकतें करता हूँ तो मुझे बहुत अच्छा लगता है ।मैं बड़ा होकर उनके जैसा ही सफल व्यक्ति बनना चाहता हूँ। वैसे तो पापा बिना बोले सब कुछ देते हैं पर मैंने पापा से उनका लैपटॉपअपने लिए मांगा और उन्होंने  तुरंत दे दिया ये मुझे सबसे अच्छा लगा। मेरी मम्मी बताती हैं कि जब मैं पैदा हुआ था तब पापा ने कार खरीदी वो बोले मेरा बेटा लोकल बस से नही जाएगा ।और मेरे लिए सिंथेसाइजर पहले से ही ले आये जब मुझे बजाना भी नही आता था अब जब मैं और पापा साथ में बजाते हैं तो बहुत खुशी मिलती है। love you papa।
लखनऊ से आद्रिका मैं तो अपने पापा की परी हूँ वो मुझे सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं ।मम्मी ने जब बताया कि मेरे पैदा होने से पहले ही पापा ने मेरा नाम गौरी सोच रखा था तो मेरी खुशी का ठिकाना ही नही था इससे ही पता चलता है कि वो मुझे कितना प्यार करते हैं।  जब पापा दिल्ली टूर पर गए थे तो मैंने उनसे एप्पल वाली घड़ी मांगी थी और जब वो वापस आये और मेरी घड़ी लेकर आये मैं बहुत खुश थी। मेरी मम्मी जब भी मेरी शिकायत उनसे करती हैं पापा मेरी साइड ही लेते हैं  मुझे बहुत मज़ा आता है।मेरे पापा मेरे सुपर हीरो हैं वो हमेशा हँसाते रहते हैं। love you papa।
लखनऊ से रचना अग्रवाल भगवान के रूप में माता-पिता ही हैं जो हमें इस दुनिया में मिलते हैं जिनकी छाया में हमें दुनिया का सबसे बड़ा सुख मिलता है।जीवन में पिता का होना बहुत जरुरी होता है बिना पिता के जीवन मानो बिना छत के घर, बिना आसमान के जमीन का होना है| पिता का जीवन में बहुत बड़ा भाग होता है जिसकी व्याख्या करना बेहद मुश्किल है.पिता हमारे जीवन में बहुत महत्व रखते हैं पिता न होते तो शायद मेरा कोई अस्तित्व ही न होता| पिता बिना किसी लोभ के अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी मेहनत करते है ताकि उनका बच्चा पढ़ लिख कर दुनिया में कुछ अच्छा कर सके।जीवन का आधार ही पिता है, पिता से ही घर होता है| पिता ही जीवन में सबसे महत्वपूर्ण होते है बिना पिता के जीवन नरक सा लगता है. माता पिता के बिना जीवन अनुसाशन के बिना ही बीतता है कोई रोक टोक नहीं होती है मगर जीवन एक कटी हुई पतंग के सामान हो जाता है.आज मेरे पापा मेरे साथ नहीं हैं।उनकी कमी हमेशा बनी रहती है और रहेगी। उनके जाने से जीवन में जो रिक्तता आई है, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। मैं तो उनके अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाई,जिसका दुख मेरे साथ ही इस दुनिया से जाएगा। वो मेरे पापा के साथ साथ मेरे एक बहुत अच्छे टीचर भी थे।इतने अच्छे से हर पाठ पढाते थे  कि उनकी सिखाई हुई कोई भी बात भूली नहीं हूँ अभी तक।उन्होंने हमेशा हम दोनों बहनों को बेटों से ज्यादा अहमियत दी।हिन्दी, इंग्लिश, गणित तीनों ही विषय पर उनकी अच्छी पकड़ थी।जीवन जीने की कला उन्होंने ही सिखाई।मेरे पापा हम बच्चों की हर छोटी बड़ी बात को बिना कहे ही समझ जाते थे। आज मैं जो कुछ भी हूँ सब उनकी अच्छी परवरिश का ही नतीजा है।अपने पापा की एक सीख आज याद आती है और उनकी उस सीख से आज भी बहुत संबल मिलता है.. बचपन में जब मुझे किसी की कोई बात बुरी लगती थी और मैं पापा के सामने उसको कुछ बुरा भला कहती थी तो पहले तो वो पूरी बात सुन लेते थे, फिर एक दिन उन्होंने बड़े प्यार से अपने पास बिठाकर समझाया  कि बेटा ,अगर कोई तुम्हारे साथ कुछ गलत करे तब भी तुम उसके बारे में गलत कभी मत सोचना, अच्छा ही सोचना क्योंकि भले ही हम सब एक दूसरे से दूर हों,लेकिन मन की तरंगों के माध्यम से हमेशा एक दूसरे से जुड़े रहते हैं और तुम जिसके बारे में जैसा सोचोगी ,मन की इन्हीं तरंगों के माध्यम से उसको सब कुछ पता चल जाएगा। तुम उसके बारे में अच्छी सोच रखकर उसके व्यवहार में परिवर्तन भी कर सकती हो।आज मैं अपने पापा की सिखाई उस बात पर अमल करती हूँ और मुझे गर्व है कि उन्होंने मुझे जीवन जीने की कला सिखाई।मेरी हर फरमाइश को हमेशा पूरा किया। बचपन में हम लोगों को टाॅफी,बिस्कुट, चाॅकलेट बहुत पसंद था,और मेरे पापा का नियम था कि शाम को लौटते समय कभी खाली हाथ नहीं आते थे। ,जैसे जैसे समय बीतता जाएगा ,हर जख्म वैसे वैसे ही भरता जाएगा ,मगर उनके साथ बिताया हुआ हर पल, हमेशा याद आता रहेगा 
लखनऊ से चॉंदनी मिश्रा इस दुनियां में सिर्फ पिता ही होता है जो चाहता है कि मेरे संतान मुझसे हर क्षेत्र में आगे रहे।मेरे पापा बहुत मेहनती ,ईमानदार, समय के पाबंद और सदा दूसरों की मदद करने में सदा तत्पर रहते है। मेरी सारी जिद पूरी होती थी और जो  जिद सही नहीं लगती समझा देते थे।मुझे घूमने का बहुत शौक था तो हर रविवार कहीं न कही  घुमाने ले जाते थे।आज भी मै कभी परेशान होती हु तो कोलकाता में रहते हुए भी मेरी आवाज से पहचान जाते है कि मै परेशान हूं।हर विषय पर उन्हें बहुत ज्ञान हैतो अभी भी उनसे सलाह लेती हूं। बचपन से   जो आदत पड़ गई है कि पापा सुपर हीरो है और है भी।"सबसे प्यारा कौन मेरे पापा"।
लखनऊ से नीरज शुक्‍ला "पिता" हमारा जन्मदाता.. वट वृक्ष की भांति अपनी भुजाओं में बच्चों को समेटे एक अज़ीम शख्सियत का मालिक..बिना कहे बच्चों के मन की बात समझने वाला,जीवन के दुःख दूर कर सुख सम्रद्धि प्रदान करने वाला,परिवार रूपी गाड़ी का इंजन जो बिना रुके बिना थके अपने परिवार की परवरिश की चिंता में मगन,अपनी परेशानी की छाया मात्र भी परिवार पर न पड़ने देने वाला ईश्वर का साक्षात स्वरूप होता है।मेरे पापा"श्री कैलाश नाथ मिश्र"जिला जज की पोस्ट से रिटायर हुए थे,अत्यंत सरल, ईमानदार, समय के पाबंद,शिवभक्त थे,आज उनके लिए"थे"लिखने में कलेजा फटा जा रहा है क्योंकि वो हमारे बीच नहीं हैं अभी 4 फरवरी को अचानक गोलोकवासी हो गए और हम सबको उनके बिना जीना बेहद मुश्किल प्रतीत हो रहा है,हम सब उनकी जान थेऔर वो हम सबकी ज्यादा क्या कहूँ शब्द कम पड़ रहे हैं,कुछ उनके लिए लिखा उसकी चंद पंक्तियां साझा कर रही हूँ बाकी धीरे धीरे करूँगी..

"मेरे पापा मेरी जान
थे दुनियाँ में सबसे महान,
उनके वरदहस्त ने मुझको
दुनियाँ में दी नई पहचान
भावुक सरलहृदय था उनका

करते रहते शिव गुणगान
सोडावाटर जैसा गुस्सा
पर बच्चों में बसती जान
आपके जैसा था ना कोई

ना ही कोई दूजा होगा
सबका जीवन अब भी होगा
पर उसमें ना जीवन होगा
मेरे पापा मेरे प्राण...
लखनऊ से अर्चना गोस्वामी आज का टॉपिक है पापा से फरमाइशी प्रोग्राम का तो दोस्तों मेरे पापा थोड़ा अलग है हमारे पापा कम बोलते थे उन्होंने कभी प्यार नहीं दिखाया।उनके सामने जाते ही हम सब भाई बहन कांपने लगते थे इतना डरते थे कि बस पूछो मत हमारे पापा लखनऊ में रहते थे और हम लोग आगरा में तो वह महीने में एक बार आते थे और दादी मां का प्रवचन उन्हें ठंडा कर देता था फिर फरमाइश का प्रोग्राम तो सोच ही नहीं सकते थे। पिताजी से घर में सभी लोग डरते थे।  कक्षा 8 तक हमने नहीं जाना कि हमारे पिता का प्यार क्या होता है पर हाई स्कूल का एग्जाम पास की तब हम बहुत अच्छे नंबर से पास हुए पिताजी हमारे मथुरा में थे जब उनको पता चला कि हम अच्छे नंबर से पास हुए है तब वह जब आए हमको बुलाया डर के मारे हवा खराब उन्होंने हमारे हाथ में जिंदगी मैं पहली बार कोई गिफ्ट दिया जब मैंने वह गिफ्ट खोला उसमें एक सोने की अंगूठी थी। पहली बार हम बहुत खुश हुए और हम रोने लगे। घर के सारे लोग थे। सब बोले रो क्यों रही हो खुशी के आंसू थे। तब जाना जरूरी नहीं की पिताजी प्यार को एक्सप्रेस करें वह दिल से अपने बच्चों को प्यार करते है।तब से पिताजी से हमारा डर कम हुआ और हम उनसे बात करने लगे फिर तो यह था कि हम मार्केट भी उनके साथ जाने लगे, टीवी भी साथ बैठकर देखने लगे थे थोड़ा खुल गए थे। फिर तो हमारा आए दिन फरमाइशी प्रोग्राम चलने लगा कभी पापा से आइसक्रीम की फरमाइश तो कभी कपड़ों की फरमाइश वो दिन जिंदगी भर याद रहेगा।पापा मेरे प्यारे पापाआज के लिए इतना काफी है


लखनऊ से ज्‍योति किरण रतन जी की विशेष पेशकस