चाँद - अजनबी

रूप अइसन की जगमग बहार हो गईलऽ।
घरवा आगन में चंदा के तार हो गईलʼऽ।।


जब से लागल तोहार, रस के छिटा।
हमरा लउकेला सगरों, मीठा मीठा।।
    सभे आपन बा आपन संसार हो गईलऽ।
    धरवा- - - - 


झम झम बरसे, रसीली  बदरिया।
छम छम नाचे, रंगीली बिजुरिया।।
      सावन भादो के नैना दो चार हो गईलʼऽ।
      घरवा- - - - 


धरती पहिर ले ली, धानी चुनरिया।
चंदा संग झूला ,झुलावे बदरिया
     हियरा आपन बा क्इसे तोहार हो गईलऽ।।
     धरवा - - - -


उपेन्द्र अजनबी 
सेवराई गाजीपुर उ प्र 
मो 7985797683