तुम्‍हारे बिन - किरण

संजना की बेटी अपर्णा के विवाह की तिथि तय हो चुकी है | दो महीने बाद शादी है, प्रसन्नता और गम के भाव छिपाए वह उधेड़बुन में लगी है कि सम्पूर्ण व्यवस्था किस प्रकार होगी ? अब तक तो सब कुछ अकेले ही सँभालती आई है...आज इस मोड़ पर उसे कपिल की बहुत याद आ रही है | अपर्णा सिर्फ सात साल की थी जब उसके पिता सबको बेसहारा करके इस दुनिया को छोड़ कर चले गए थे | नीतू तो मात्र तीन बरस की थी | एक विधवा का दर्द भला कौन कैसे जान सकता है? ये तो शुक्र था कि कपिल अपने पीछे जमीन और मकान छोड़ गया था किंतु केवल जमीन पर गुजर बसर कैसे हो सकती थी ?  इसलिए  संजना ने गैर सरकारी विद्यालय में बतौर अध्यापिका शिक्षण कार्य आरम्भ कर दिया | 
तुम्हारे बिन न जाने कैसे-कैसे मैंने अपनी गृहस्थी को सँभाला है ? जमाने की गन्दी निगाहों से बचते हुए अपनी बेटियों को इतना साहसी बनाया है कि मजाल है कोई उनके सामने टिक पाए ! आज प्रेरणा का रिश्ता अच्छे घर में तय हो गया है | अगर तुम होते तो....सोचते-सोचते वह अतीत की यादों में खो गई |कहने को तो कपिल जमीदार घराने से ताल्लुक रखता था पर उसके जाने के बाद जब संजना ने नौकरी करने की सोची तो परिवार में किसी को पसन्द नहीं आया | 
संजना निर्भीक और स्वाभिमानी थी, इसलिए वह नहीं चाहती थी कि उसे हर छोटी बड़ी चीज के लिए बार-बार किसी के सामने हाथ फैलाना पड़े | आखिर उसकी बेटियों के भविष्य का भी सवाल था | ग्रामीण परिवेश होने के कारण उसे अक्सर लोगों के कटाक्ष का भी सामना करना पड़ता | जैसे-तैसे दो वर्ष व्यतीत हो गए | एक दिन उसे सूचना मिली कि उसे सरकारी विद्यालय में नौकरी मिल गई है | उस दिन उसका गाँव छोड़कर शहर जाने का फैसला कठिन अवश्य था पर सर्वथा उचित था | अपनी बात मनवाने के लिए उसे न जाने कितने पापड़ बेलने पड़े थे | स्वीकृति के बदले परिवार से मनमुटाव भी मोल ले लिया  |
नई जगह, नए लोग... घर और बाहर के सभी काम करने में पहले तो उसे थोड़ी कठिनाई हुई पर धीरे -धीरे सब कुछ सामान्य हो गया | वक्त के थपेड़ों ने अब उसे इतना मजबूत बना दिया था कि  हर कोई उससे बात करने से डरता था | उसके तर्क के समक्ष किसी का टिक पाना भी कठिन था | बच्चियों की परवरिश में वह अपनी दुख तकलीफ सब कुछ भूल चुकी थी |  बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए एक -एक करके पूना भेजने के बाद वह एकदम अकेली हो गई | खाली घर मानो उसे काटने को दौड़ता था | चिन्ता और तनाव में ठीक से नींद तक नहीं आ पाती थी | यही तनाव उसके  चिड़चिडेपन का कारण बन चुका था |
विचारों में नकारात्मकता का प्रभाव बढने के कारण वह चिन्तित थी | तभी उसके मन में विचार आया कि क्यों न अपने नृत्य के शौक को ही पूरा किया जाए | 
विद्यालय और महाविद्यालय में उसने कत्थक में बहुत सी प्रतियोगिताएं जीती थीं | इतने वर्षों तक अभ्यास न होने के कारण उसने शाम की कक्षा में प्रारम्भ से कत्थक सीखना शुरू कर दिया | हुनर कभी समाप्त नहीं होता, यही वजह रही कि दो वर्ष की मेहनत के उपरांत वह इस क्षेत्र में अच्छी खासी पहचान बना चुकी थी | आज  उसकी दोनों बेटियाँ अपने पैरों पर खड़ी हैं | 
किसी चीज की कमी नहीं है किन्तु कपिल की कमी उसे सदैव खलती है | काश ! आज तुम होते तो कितना अच्छा होता... स्वयं से बातें करते हुए वह शादी के सामान की लिस्ट बनाने में व्यस्त हो गई |


किरण बाला 
 (चंडीगढ़)