तुम्हारे बिना - डॉ अलका पाण्डेय 

आज सुबह से ही आंधी तूफान ने बंवडर मचा रखा था! बादल फट कर बरस रहे थे चारों तरफ घनघोर अंधेरा छाया हुआ था हवाएं इतनी जोर से चल रही थी की चारों ओर साय - साय की आवाजे और एक डरावना माहौल पैदा हो रहा था मोहिनी के दिल में भी इसी तरह का बवंडर मचा हुआ था ! आज पूरा घर खाली हो गया था।
सारे मेहमान चले गये थे , कैप्टन सुनील को गये  पंद्रह दिन हो गये थे , मोहिनी को लग रहा था मानो सदियां बीत गई है , 
बीस दिन पहले ही तो सुनिल छुट्टी ले कर आया था मुम्बई , एक महिने के लिये , गोवा की टिकट कराई सब लोग गोवा जाने वाले थे ...मोहिनी सब को आवाज दे रही थी  खाने का समय हो।गया है अंदर आ जाओ , पर मोहिनी का बेटा व पति सुनिल दोनो एक जैसे ,"खेलते है तो दुनियां भूल जाते हैं फिर आज तो पुरा परिवार जमा था क्रिकेट खेला जा रहा था कहां कोई सुनता , मोहिनी गुस्से से "मां जी से बोली मां आप अपने बेटे और पोते को बुलाओ मेरी नही सुनते, ये बाप बेटे फिर आज तो सब जमा है कहां सुनेगे , "मांजी कहती  है  भूख लगेगी तो आ जायेगे मेरी कुर्सी भी बहार रख दे मैं भी तो मैच देखू मेरे बेटे का व जरा आंखों को ठंडा करु  , ठीक है मां जी "मोहिनी " कुर्सी लेने चली गई अचानक जोर से चिल्लाने की आवाज से वह बहार भागी तो देखती है सुनिल जमीन पर गिरा है सुनिल के आस पास सब खड़े है कोई पंखा झल रहा है कोई पानी के छींटे मार रहा है मां जी डाक्टर बुलाओ २ चिल्ला रही है। मोहिनी दौड़ कर डाक्टर बुलाती है , तब तक सब लोग सुनिल को उठा कर  बंगले के अंदर ले आते है । डाक्टर आते है।और सुनिल को मृत घोषित कर देते है।
घर में कोहराम अनहोनी "अचानक "अच्छा भला खेल रहा था बल्ला घुमाया ही था की धड़ाम और खेल खत्म ..चालीस साल का सिर्फ पैक्स साल की मोहनी , सात साल का बेटा .... 
क्या हो गया ...क्यो हो गया ? कल तो हम लोग गोवा घूमने जा रहे थे , मोहिनी को कोई होश नही था सबने उसे हिलाया तो वहजोर से चिखी सुनिल तुम मुझे धोखा नही दे सकते , "कैसे रहूंगी तुम्हारे "बिना , कैसे पालूंगी तुम्हारे बेटे को वह मेरी सुनता नही है, तुम्हें बुलायेगा तो क्या कहूंगी ....
"कैसे रहूंगी तुम्हारे बिना " कहते कहते बेहोश हो गई , 
सबने पानी के छींटे मारे व होश में लानेकी कोशिश की  पानी पिलाया जरा होश आया तो मां जी ने मोहिनी को गले लगा लिया और मोहिनी को खूब रोने दिया जब मोहिनी रो रो कर निढाल हो गई तो , "मां जी ने कहां "अंतिम दर्शन "कर लो , "मोहिनी " फिर हमारा सुनिल हमें कभी दिखाई नहीं देगा ....
सब लोग आ गये है । अर्थी को लेजा रहे है । मोहिनी लाश की तरफ गई पैर छू फूल चढ़ा कर वही बैठ गई , सुनिल कुछ तो सोचना था "मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी ", कैसे सब सम्भालूगी ,सब ने मोहिनी को उठाया उधर सुनिल की अर्थी भी उठाई गई , "राम नाम सत्य है " कह कर ले गये , मोहिनी को कमरे में लाकर बैठा दिया गया। 
सब क्रिया कर्म कर के मेहमान दसवां , तेरहवीं  , बरसी , सब निपटाकर सांत्वना देकर अपने अपने घर चले गये, आज घर में मां जी और मोहिनी , अनमोल ही रह गये थे सुनिल के जाने थे बाद अनमोल एक दम चुप  हो गया था। कुछ नहीं बोलता , मोहिनी की मम्मी ने कहां भी बेटा तुम चाहो तो अपने घर चलो , मोहिनी ने कहा मां मेरी मां यहां है मैं उन्हें छोड़ कर कहीं नही जाऊंगी , मेरे और अनमोल के अलावा उनका अब कौन है ! सुनिल तो चला गया उसके बस में नहीं रहा , पर मैं ऐसा नहीं कर सकती मां !
कल से कुछ सोचूंगी मां , अनमोल व मां जी के लिऐ मुझे हिम्मत रख कर सुनिल की यादों के सहारे जीना पड़ेगा ! मोहिनी का जवाब सुन मोहिनी की मां कुछ नही बोली बस सर पर आशिर्वाद का हाथ रख चली गई । घर पुरा खाली , मोहिनी किचन में गई तो देखती है मां जी चाय बना रही हैं , "मोहिनी मां जी आप क्यो मैं हूं न चलो छोड़ो। मोहिनी चाय की छन्नी लेकर कहां आप बैठ जाओ , आज से आपका बेटा और बहू मैं ही हूं । जरा भी चिंता नहीं सुनिल कहीं नही गयें , हमारे आस पास ही है हमारे पुरे घर मे , हमारी यादों में और अनमोल के रुप में । मां जी हां बेटा तुम ठीक कह रही हो।जीना तो है ही , अब अनमोल के लिए ही हंस कर जियेगे ताकी वह दुखी न हो । मोहिनी ने कोरो के आंसू धीरे से पोछे व मांजी को चाय देकर खुद भी उनके पास बैठ कर चाय पीने लगी और बोली मां जी सोचती हूं कल से अनमोल को स्कूल भेजने लगूा।

डॉ अलका पाण्डेय
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