बचपन में गर्मी की छुट्टी की बात सुनकर बस एक ही बात जहन में आती थी नानी का घर। मैं इस दिन का सालभर बेसब्री से इंतजार करती थी कि कब छुट्टियां शुरू हों और गांव जाने का मौका मिले मेरी नानी का घर बहुत बड़ा था , बहुत बड़ा आँगन दरवाज़े पर कुआ , फिर तहख़ाना और बड़ा हाल तहख़ाना बहुत ठंडा रहता दोपहर को मैं मेरी सहेलियो के साथ कभी कभी तहख़ाने में हाथ से बनाए गए मिट्टी के खिलौने, पुरवे से बनाया गया तबला, सिकड़ी, गिट्टियां आदि लेकर खेलते मुझे इनसे खेलना बहुत अच्छा लगता था। नानी के यहाँ जाने पर ऐसा लगता कि मानो चैन और सुकून कहीं है, तो वो बस यहीं है। मुझे वो नानी के घर बिताए गए पल आज भी बहुत याद आते हैं। मैं कभी भरी दोपहरी में दोस्तों के साथ निकल पड़ती थी। रामदीन काका के फलों के बाग में जाकरअमियां चुरा कर खाना कबिट खाना , हाथ में नमक की पुड़िया लेकर , क्योंकि छिपकर पेड़ से तोड़कर अमिया खाने का मजा ही कुछ और होता था। दूसरों के खेतों से तोड़े गए टमाटर और जामुन से भरी थैलियां देखकर जो सुकून मिलता था, वो आज नहीं मिलता है। दिनभर घूमकर जब घर पहुंचती थी तो अम्मां का तमतमाया चेहरा देख सारी बदमाशी निकल जाती थी। और जब मम्मी पीटने आती थी, तो मुंह से बस एक ही शब्द निकलता था 'नानी'। मुझे वो तपती दोपहरी आज भी बहुत याद आती है। मेरे पहुंचने से पहले ही नानी आटे के लड्डू , सत्तू, लाई, अचार के मर्तबान तैयार कर लेती थी। पता था उन्हें दो महीने तक एक आफत की पुड़िया को झेलना है। आधे से ज्यादा समय कुऐ पर बाल्टी से पानी निकालना वही नहाना छपाक-छई में गुजर जाता था। बिजली नहीं थी, लेकिन पेड़ की वो ठंडी बयार पंखे को भी मात देती थी।
शाम होते ही चारों तरफ उड़ते जुगनुओं को देखकर ऐसा लगता था जैसे किसी ने एक साथ कई छोटी-छोटी लालटेन जला दी हों। मुझेवो जुगनुओं भरी शाम आज भी बहुत याद आती है। मुझे आज भी याद आता है छत पर अपनी पंसदीदा जगह पर सोने के लिए झगड़ा करना और जगह नहीं मिलने पर नानी की गोद में सिर रखकर सो जाना। हालांकि नींद जल्दी नहीं आती थी, क्योंकि खुले आसमाने के तले लेटकर तारों को टिमटिमाते देखने का मौका रोज-रोज कहां मिलता था। सच में, ऐसा लगता था जैसे एक बड़ी-सी थाली में किसी ने सफेद मोती बिखेर दिए हों। वहीं पर मैंने पहली और आखिरी बार दो तारों को एक साथ टूटते हुए देखा था। तारें गिनते-गिनते कब मैं सो जाती थी, पता ही नहीं चलता था। वो सितारों के आंचल में लिपटी हुई रात आज भी बहुत याद आती है।
एक बार तहख़ाने के दरवाज़े पर साँप निकल आया बहुत भगाने की कोशिश की पर जाने का नाम ही नहीं तब पड़ोस के टोले से एक आदमी को बुलाया गया उसने उसे मार कर जलाया पहली बार साँप मारते मैंने ननिहाल में देखा ।
डॉ अलका पाण्डेय
(अगनिशिखा मंच)
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