कद्र-मनोरमा

विशेष कहानी 

दो दिन से बुखार में तपती सीमा को आज थोड़ा आराम आया तो आदतन रसोई में चली गयी।सारी रसोई फैली हुई थी।जूठे बर्तनों से सिंक भरी पड़ी थी ,स्लैव पर चाय आदि के सूख चुके निशान।न पति को काम करने की आदत थी न बेटे को।बुखार में पड़ी दोनों की चिड़ चिड सुनती रहती थी। उसने गैस पर चाय बना कर पानी गर्म करने रख दिया। चाय पीकर पहले किचन साफ की फिर गर्मपानी से सारे बर्तन साफ किये। रसोई अब रसोई जसी लग रही थी। धीरे धीरे सारी सफाई निबटा कर वह आराम करने लगी।दो दिन के बुखार ने बदन तोड़ दिया था। आँख बंद की ही थीं कि "तुम करती ही क्या हो सारे दिन घर में।हर रोज कभी सर दर्द कभी बुखार तो कभी कोई और झंझट।
काम न करने के बहाने।"पति के स्वर कान में गूँज गये।आँख से दो आँसू ढुलक तकिये में जज़्ब हो गये। एक घंटे आराम करने के बाद सीमा ने फ्रिज़ खोला। पति के ऑफिस से आने का समय हो रहा था। बेटा भी स्कूल से आने वाला था। फ्रिज में भी सब बेतरतीव पड़ा हुआ था।सब्जी निकाल कर धोई, और कुकर में चढ़ा दी। फिर फ्रिज साफ किया। इधर उधर बिखरे गंदे कपडे वाशिंग मशीन में डाल वह आटा गूंथने लगी। तभी कॉलबेल की आवाज सुन उसने गैस पर चाय का पानी चढ़ा दरवाजा खोला।देखा पति  ही थे साथ में बेटा भी। "अरे ,अब बुखार कैसा है?"घर मे चारों तरफ नज़र दौड़ाते रवि ने पूछा। "ठीक है "कह कर रसोई में चल दी। जरा चाय बना दोगी? ....रहने दो ,मैं ही बना लेता हूँ।कहकर रसोई की तरफ बढ़े ही थे कि चाय लेकर सीमा रसोई से निकली ।साथ में पोहा भी था।पानी लेने के लिए रवि रसोई में गये,तो रसोई देख चौंक गये। चेहरे पर शर्मिंदगी एक मिनिट को झलकी। रात का खाना बनाने सीमा रसोई में गयी तो रवि भी साथ आ गये।जब तक सीमा ने फुलके उतारे ,रवि ने कटोरी में सब्जी परोसनी शुरु कर दी। आप रहने दीजिए मैं कर लूँगी।आप खाइये। नहीं सभी फुल्के सेंक लो साथ ही खायेंगे। कहते हुये बेटे को आवाज लगाई। 'लो बेटे, ये ग्लास और पानी टेवल पर रख के आओ।" खाने से निबट सीमा रसोई साफ करने लगी तो रवि ने हाथ बँटाना शुरू कर दिया। सीमा बर्तन माँज रही थी ,रवि ने धोकर रख दिए। "चलो अब तुम आराम कर लो, थक गयी होगी। बाकी हम सुबह कर लेंगे ।"
पर , आप परेशान न हों मैं कर लूँगी। आदत है मुझे। "मुझे माफ कर दो सीमा ,तुम्हारे बीमार होने पर पता लगा कि तुम क्या करती थी घर पर रह कर। तुम से घर की जान है। दो दिन में ही परेशान हो गया था।और तुम्हारे लिए भी परेशानियाँ बढ़ा दी।"हाथ में पानी का ग्लास व दवा देते हुये रवि की आवाज में पश्चाताप साफ झलक रहा था। खुशी से सीमा की आँखें भर आईं।उस अश्रुबूंदों को रवि ने अपनी हथेलियों में संजो लिया।



मनोरमा जैन पाखी