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मेरी प्यारी सावन की नन्ही बूँदों...
चांदी की लड़ी हो तुम,
काँच की मोती हो, कितनी
शीतल हो तुम,
बारिश की बूँदों कितनी नन्ही सी
हो तुम,
बेज़ुबान प्यार करती हो सबसे तुम,
ले जाए जहां पवन वहां चली जाती
हो तुम,
उलझ पवन से कहीं भी खो जाती
हो तुम,
बरसा कर सावन के बादल को धरा
तृप्त करती हो तुम,
सुनो अब न सताना मेरी प्यास को
और ना बढ़ाना,
न तड़पना मेरी आस को रोज ही चली आना तुम,
आती हो जब बचपन साथ ले आती हो तुम,
सावन का झुला भी संग - संग में लाती हो तुम,
बाबुल के आंगन की यादों को जगाती
हो तुम,
टीप - टीप कर आती हो मन को
भिगाती हो तुम,
अपनी बूँदों से अमृत रस टपकाती
हो तुम,
किसी को नहलाती तो किसी को भगाती
हो तुम,
पर क्या कहूँ बड़ा लंबा इंतज़ार कराती
हो तुम,
प्यासे मन को और प्यासा बनाती हो तुम,
कितनी छोटी हो किन्तु सबसे बेज़ुबान प्यार
करती हो तुम....!!
इंदु उपाध्याय पटना
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